मेरी यात्राएं हमेशा मुझे मेरे और करीब लाती हैं

श्रृंखला पाण्डेय 29-02-2020 05:26 PM Soul Journey
हर किसी की जिंदगी में यात्राओं के मायने अलग होते हैं। कोई नई जगहों को देखना चाहता है तो कोई कुछ नया सीखना चाहता है, लेकिन मेरी लिए यात्राएं हमेशा मुझे खुद से मिलाती हैं। दुनिया भर के तनाव, उलझन, काम और जिम्मेदारियों से जब ऊबने लगती हूं तो खुद को तलाशने निकल पड़ती हूं एक यात्रा पर और यकीन मानिए मैं हर बार कामयाब होती हूं। कुछ महीनों की पॉजिटिव एनर्जी का कोटा लेकर वापस आती हूं और जैसे ही ये खत्म होने लगती हैं, दूसरे सफर की तैयारी शुरू कर देती हूं। इस बार मन था पहाड़ों से हटकर कहीं और सुकून तलाशने का, बारिश में जमकर भीगने का, हरे-भरे जंगलों में बेखौफ होकर टहलने का और संमदर किनारे घंटों बैठकर अपनी मनपसंद लेखिका की कहानियों में खोने का।

प्लान तो एक महीने पहले ही बन चुका था महाराष्ट्र जाने का और इस बार भी हमेशा की तरह मैं सिर्फ लड़कियों के साथ जाना चाहती थी। यहां आप मुझे दकियानूसी ख्यालात का मत समझिएगा इसके पीछे मेरा मकसद सिर्फ इस बात को सिरे से नकारने का रहता है कि बिना किसी लड़के के हम नई जगहों पर सुरक्षित यात्रा नहीं कर सकते। आप यूं कह सकते हैं कि फेमिनिज्म का पलड़ा यहां भी थोड़ा हावी था। लगातार टीवी और अखबारों में महाराष्ट्र की बारिश और बाढ़ की खबरें पढ़कर एक बार को मन थोड़ा घबराया लेकिन फिर सोचा अब जो होगा वहीं देखा जाएगा। मेरे साथ जाने के लिए पुरानी कलीग दिति और मेरी छोटी बहन अंजलि तैयार थीं, हमारे टिकट हो चुके थे और हम इस खूबसूरत सफर पर कई सारी प्लानिंग ये करेंगे वो करेंगे के साथ निकल पड़े थे। ट्रेन रात 7 बजकर 45 मिनट की थी और हमें स्टेशन पहुंचने में देर हो रही थी, ऐसा लगा कि सब चौपट होने वाला है, ट्रेन अगर छूट गई तो क्या होगा। हमने कैब ड्राइवर से किसी भी तरह स्टेशन पहुंचाने के लिए कहा इसपर वो हंसकर बोला जाने की इतनी एक्साइटमेंट थी तो कम से कम घर से टाइम से निकलतीं। स्टेशन पर पहुंचते-पहुंचते सिग्नल हो चुका था और ट्रेन चल पड़ी थी, हमें आगे जो डिब्बा मिला उसी पर चढ़ गए और एक बार भगवान को शुक्रिया अदा कर अपने डिब्बे की खोज में लग गए, पता चला कि अभी जंग लड़नी बाकी है हमें 9 डिब्बे पार करने थे।  अपना-अपना सामान लादे लोगों से भइया थोड़ा साइड होना कहते -कहते हम किसी तरह अपनी सीट तक पहुंचे। मन ही मन खुश थे कि कम से कम ट्रेन तो नहीं छूटी और दूसरी तरफ ये प्रतिज्ञा ली कि अब स्टेशन हमेशा समय से पहुंचेंगे। हालांकि वो आज तक पूरी नहीं हो पाई। मेरे व्हाट्सऐप पर लगातार खबरों के लिंक आ रहे थे कि मुंबई में बारिश के चलते जनजीवन अस्त व्यस्त। लोगों के फोन कॉल्स भी आ रहे थे कि टीवी नहीं देखती क्या अभी क्यों जा रही हूं लेकिन हममें न जानें कहां से इतनी निडरता आ गई थीं कि किसी की बात का कोई असर नहीं था। दूसरे दिन सुबह उठे तो मौसम बहुत ही खूबसूरत था, बाहर हरियाली ही हरियाली थी, काश हमारे लखनऊ की तपती धूप भी इनमें बदल जाती। काले बादल बीच-बीच में हल्की बारिश की फुहारों से खिड़कियां भीग रहीं थीं। हमने चाय पी और बाहर के नजारों को निहारने लगे। सफर लंबा था, इसलिए हमारी आस-पास के लोगों से थोड़ी बातचीत होने लगी थी, एक पैंट्री वाले से भी हमारी पहचान हो गई थी और उसने हमें थोड़ी देर में दोबारा अदरक की अच्छी सी चाय पिलाने का वादा किया। सफर इतनी जल्दी कट गया कि पता ही नहीं चला हमें कल्याणपुर स्टेशन उतरना था और बगल की सीट वाले अंकल को भी वहीं उतरना था।

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