कल्चर

प्राकट्य से उपसंहार तक, श्री कृष्ण के जीवन से जुड़े मंदिर

एक मार्गदर्शक, एक दार्शनिक, एक नटखट बच्चा, एक छोटा सा भगवान, एक सखा, एक चमकते तारे की आभा वाला, एक शूरवीर, ज़िन्दगी के हर पहलू में, हर रूप में कृष्ण हैं। वो राधा का प्रेम है तो रुक्मिणी का जीवन, यशोदा का लाल है तो देवकी का दुलार, गोपियों का श्रृंगार है तो सबका तारनहार। कृष्ण प्रेम भी हैं और प्रतिशोध भी, कृष्ण विराट हैं और बाल भी। वह एक अद्भुत संन्यासी, एक अद्भुत गृहस्थ और साथ ही एक शक्तिशाली नेता थे। भगवान कृष्ण के जीवनकाल में हुई सभी घटनाओं से जुड़े कई मंदिर भारत के विभिन्न कोनों में हैं। तो हम बताते हैं आपको कि इस जन्माष्टमी पर आपके कान्हा की ज़िंदगी से जुड़े कुछ मशहूर मंदिरों के बारे में…

हनुमान जी की सबसे ऊंची मूर्ति है यहां, दिलचस्प है इतिहास

शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं की जीवंत सुंदरता के बीच बना, जाखू मंदिर एक प्राचीन हनुमान मंदिर है जो पवन पुत्र हनुमान के भक्तों के बीच बेहद प्रसिद्ध है। शिमला के मशहूर दर्शनीय स्थलों में से एक इस मंदिर में  भगवान हनुमान की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति है। लोग यहां प्रभु के दर्शन के लिए तो आते ही हैं, शिमला आने वाले हर धर्म और संप्रदाय के टूरिस्ट्स इस विशाल मूर्ति को देखने भी आते हैं। यह मंदिर समुद्र तल से 8048 फीट की ऊंचाई पर है। 2010 में हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार ने यहां 108 फीट की हनुमान प्रतिमा स्थापित की थी। इस मूर्ति को पूरे शिमला से देखा जा सकता है। श्रद्धालु यहां पैदल, निजी कार या रोपवे से जाते हैं। शिमला में रिज नामक जगह से यहां जाने के लिए रोप वे लिया जा सकता है। जाखू मंदिर से पास के शहर संजौली का व्यू भी बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का के अद्भुत नज़ारे को देखने के लिए कई ट्रेकर्स भी यहां आते हैं। सिर्फ मंदिर ही नहीं, यहां तक पहुंचने का रास्ता भी बहुत सुंदर है। 

कोटिलिंगेश्वर : जिस मंदिर में एक करोड़ से ज़्यादा शिवलिंग हैं

सावन का महीना यानी बारिश का महीना, हर तरफ हरियाली बिखेरने का महीना, त्योहारों का महीना, झूलों का महीना, गीतों का महीना… और इन सब से बढ़कर भगवान शिव का महीना। यूँ तो ईश्वर की पूजा के लिए न कोई दिन में बंध सकता है और न रात में, न वक़्त में और में और न हालात में, न महीने में और न साल में लेकिन इस महीने में ऐसा लगता है जैसे हर तरफ महादेव की भक्ति हो, हवा में भी हर-हर शम्भू गूंजता सुनाई देता है। अब जब बात शिवार्चन और आस्था की चल ही रही है तो हम आपको कर्नाटक के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं, जहां आप जिधर भी नज़र घुमाएंगे आपको सिर्फ शिवलिंग ही नज़र आएंगे। हम बात कर रहे हैं कोटिलिंगेश्वर मंदिर की। कर्नाटक के कोलार जिले का कोटिलिंगेश्वर मंदिर एक ऐसा मंदिर है, जो बहुत पुराना नहीं है लेकिन फिर भी बहुत सारे भक्तों और पर्यटकों का जमावड़ा यहां लगा रहता है। कोलार वैसे तो अपनी सोने की खदानों के लिए मशहूर है, लेकिन आप उन्हें देखने नहीं जा सकते। हालांकि, बंगलुरु से 70 किलोमीटर की दूरी पर बसे में आप कोटिलिंगेश्वर मंदिर के दर्शन ज़रूर कर सकते हैं।  बंगलुरु से यहां तक आने के लिए सड़क के दोनों ओर हरे- भरे खेत देखते हुए आप मंदिर पहुंच जाएंगे। 

चित्रकूट में इन 5 जगहों को देखना न भूलें

चित्रकूट में घूमने के लिए कई दिलचस्प जगहें हैं। घंटियों की आवाज से गुलजार नदी घाटों से लेकर गर्व और अखंडता के प्रतीक ऊंचे किले और महल तक, झरनों से लेकर जंगल तक यहां सबकुछ है। वैसे तो यहां कई ऐसी जगहें हैं जो आपका दिल जीत लेंगी लेकिन हम आपके लिए चित्रकूट की 5 ऐसी जगहों की जानकारी लाए हैं जिन्हें देखे बिना आपकी यात्रा पूरी नहीं होगी।कामदगिरी कामदगिरी एक जंगली पहाड़ी है जो चारों तरफ से कई हिंदू मंदिरों से घिरा हुई है। इसे चित्रकूट का दिल माना जाता है। तीर्थयात्री इस पहाड़ी के चारों ओर इस विश्वास के साथ परिक्रमा करते हैं कि उनके सभी दुखों का अंत हो जाएगा और ऐसा करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होंगी। कामदगिरी का नाम भगवान राम के दूसरे नाम कामद नाथ जी से लिया गया है, इसका मतलब सभी इच्छाओं को पूरा करना है। इस पहाड़ी की परिक्रमा के 5 किलोमीटर के रास्ते पर कई मंदिर हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध भरत मिलाप मंदिर है। यह उसी जगह पर बना है जहां भरत ने भगवान राम से मुलाकात की और उन्हें अपने राज्य में वापस आने के लिए मना लिया था। कामदगिरी पर्वत का कुछ भाग उत्तर प्रदेश में तो कुछ मध्य प्रदेश में पड़ता है।गुप्त गोदावरीगुप्त गोदावरी दो गुफाओं का समूह है। यहां अंदर जाने के लिए एक पतला सा रास्ता है जिसमें अमूमन हर कोई फंस जाता है। दूसरी गुफा से पानी की धाराएं निकलती हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक बार भगवान राम और लक्ष्मण ने अपनी गुप्त बैठकें कीं, गुफा में इस बात की पुष्टि करते हुए सिहांसन नुमा कुछ रचनाएँ हैं। हालांकि चित्रकूट में ज़्यादातर धार्मिक यात्रा करने वाले लोग ही आते हैं लेकिन आजकल एडवेंचर पसंद करने वाले लोगों का भी यह पसंदीदा ठिकाना बन गया है। गुप्त गोदावरी भी ऐसे लोगों को काफी पसंद आती है।  एलीफेंटा की गुफाओं, अजंता और एलोरा की गुफाओं से मिलती जुलती यह गुफा कई लोगों को रहस्यमयी लगती है। 

वनवास के समय इन जगहों में रहे थे श्री राम

भगवान श्री राम ने सीता जी और लक्ष्मण जी सहित अपने जीवन के 14 साल वनवास में गुजार दिए। अयोध्या से जब तीनों निकले तो उन्हें नहीं पता कि कहां जाना है, कहां रहना है और क्या करना है। उनके मन में उस वक्त यह विचार था कि उन्हें अपने पिता के वचन को किसी भी हाल में पूरा करना है और जीवन के आने वाले 14 साल वन में बिताने के बाद ही वापस अयोध्या लौट कर आना है। भले ही घर से निकलते वक्त उन्हें नहीं पता था कि उन्हें कहां जाना है, लेकिन अपने इन 14 वर्षों के काल खंड में वे जहां भी गए, जहां भी रुके, सभी जगहें पवित्र और अविस्मरणीय बन गईं। कहते हैं कि अपने वनवास के दौरान श्री राम लगभग 200 जगहों पर गए और रुके। हम आपको बताएंगे उन कुछ प्रमुख जगहों के बारे में जहां वनवास के दौरान प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी गए थे…श्रृंगवेरपुर वाल्मीकि रामायण के अनुसार, अपने वनवास के लिए अयोध्या से निकलने के बाद राम जी सबसे पहले अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर पहुंचे थे। इसके बाद नदी पार करके वे प्रयागराज से 20-22 किलोमीटर दूर निषादराज गुह के राज्य श्रृंगवेरपुर पहुंचे। यहीं गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। रामायण काल में सिंगरौर को ही श्रृंगवेरपुर कहा जाता था। प्रयागराज से उत्तर-पश्चिम की ओर लगभग 35 किलोमीटर दूर यह जगह है। कहते हैं कि जब श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी यहां घाट पर पहुंचे थे तब वहां नाव वालों ने उन्हें नदी पार कराने से मना कर दिया था। इसके बाद स्वयं निषादराज गुह वहां आए और उन्होंने श्रीराम से कहा कि अगर वे उन्हें अपने पैर धोने का अवसर देंगे तो वह उन्हें नदी पार करा देंगे। श्रीराम ने उनका निवेदन मान लिया और निषादराज से वनवास की वापसी में उनके घर आने का वादा करके वह तीनों यहां से आगे चले गए। इस घटना से जोड़ने के लिए इस स्थान का नाम 'रामचुरा' रखा गया है। इस जगह पर एक छोटा सा मंदिर भी है। हालांकि इस मंदिर का कोई ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व नहीं है, लेकिन यह जगह अब पर्यटकों को भा रही है।कुरई श्रृंगवेरपुर की नदी के दूसरी छोर पर कुरई गांव है। मान्यताओं के अनुसार, श्रृंगवेरपुर से नदी पार करने के बाद राम जी इसके दूसरे छोर पर कुरई में नाव से उतरे थे और आगे के सफर की ओर बढ़े थे। इस गांव में एक छोटा-सा मन्दिर भी है, जो स्थानीय श्रुति के अनुसार उसी जगह पर है जहां गंगा को पार करने के बाद राम, लक्ष्मण और सीता जी ने कुछ देर विश्राम किया था। कुरई में नाव से उतरने के बाद श्रीराम प्रयागराज पहुंचे और वहां से यमुना को पार कर उन्होंने अपना अगला पड़ाव चित्रकूट को बनाया। चित्रकूटराजा दशरथ की मृत्यु के बाद जब भरत अपनी सेना लेकर भगवान राम से मिलने जिस जगह पहुंचते हैं, वह चित्रकूट थी। यहीं से वह श्रीराम से उनकी चरण पादुकाएं मांगते हैं और उन्हें ही सिंहासन पर रखकर राज्य चलाने की प्रतिज्ञा लेते हैं। मान्यताओं के अनुसार, चित्रकूट में कामदगिरि भव्य धार्मिक स्थल है जहां भगवान राम रहा करते थे। इस स्थान पर भरत मिलाप मंदिर भी है। तुलसीदास ने भी अपनी रचना में चित्रकूट का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है - चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़तुलसीदास चंदन घिसत, तिलक देत रघुबीर

जुलाई में बारिश के साथ लें देशभर के इन फेस्टिवल्स का मज़ा

विविधता से भरे अपने देश में हर महीने पर्वों की खुशबू तैरती रहती है। हमारे त्यौहार साल भर अपने रंगों से पूरे भारत को रोशन किए रहते हैं। जुलाई का महीना पर्वों के साथ ही साथ मॉनसून वाला भी होता है। इस महीने जहां चारों तरफ हरियाली फैलना शुरू हो जाती है, वहीं जुलाई में कई त्यौहार भी होते हैं जो इस मौसम को और खास बना देते हैं।  मॉनसून में भला किसका घूमने का मन नहीं करेगा। जुलाई में मॉनसून काफी खुशनुमा एहसास दिलाता है और तभी घूमने में आनंद आता हैं। जी हां! अगर आप भी मॉनसून के इस खास महीने में अपनी फैमिली के साथ भारत में कहीं घूमने जाना चाहते हैं, तो फिर आपका इंतजार देश के खूबसूरत ठिकाने कर रहे हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां पर हर धर्म और समुदाय के लोग अपनी संस्कृति का जश्न मनाते हैं। जुलाई महीने के विविध त्यौहार भी पर्यटकों के लिए भारतीय संस्कृति को देखने का सबसे अच्छा तरीका पेश करते हैं। जुलाई महीने में मॉनसून अपने पूरे रंग में रहता है, तो ऐसे में सुहाना मौसम इन फेस्टिवल्स की रौनक को दोगुना कर देता है। 

जहां धड़कता है श्री कृष्ण का दिल

कहते हैं कि जब भगवान श्री कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया और उनका अंतिम संस्कार किया गया तो एक हिस्से को छोड़कर उनका पूरा शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। उनका हृदय जो उनके इस दुनिया से विदा लेने के बाद भी धड़कता रहा। कहते हैं कि वह दिल आज भी सुरक्षित है और भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति के अंदर है। ओडिशा के पुरी शहर में बना भगवान जगन्नाथ का मंदिर अपने अंदर हज़ारों रहस्य समेटे है। इस बार हम आपको बताएंगे इसी मंदिर का इतिहास। 

श्राद्ध पक्ष में इन जगहों का है विशेष महत्व, पिंडदान के लिए जाते हैं लोग

भारत में भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष की शुरुआत होती है। पितृपक्ष 15 दिन चलता है यानी अश्विन महीने की अमावस्या तक। इस साल यह 20 सितंबर से शुरू होकर 6 अक्टूबर तक चलेगा और 7 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू हो जाएंगे। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। देश में ऐसी कई जगहें हैं जो पूर्वजों जहां जाकर लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। आप भी जानिए इन जगहों के बारे में...

खूबसूरत नक्काशी और गर्वीला इतिहास है इस जगह की पहचान

दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में एक छोटा सा शहर है हम्पी। विजयनगर का यह शहर भले ही छोटा सा है, लेकिन इसका नाम यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है। कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहा हम्पी आज भी अपनी कमाल की नक्काशी वाले मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। 

यहां माथा टेककर पूरी होगी मन की हर मुराद

क्यों सर जी! कोरोना ने गर्मी की छुट्टियों का कबाड़ा कर दिया न। आप ही नहीं, हर किसी के साथ ऐसा ही हुआ है। लोगों ने जो कुछ भी प्लान बनाया था, वह रेत के टीले की तरह भरभरा कर ढह गया। अब तो सारी कोशिशें जान बचाने की हैं। खैर जैसे यह वक्त आया है, देर-सवेर चला भी जाएगा। इस दौर के गुजरने के बाद आपको कहीं निकलना हो तो हमारे पास आपके लिए कुछ खास है। आज हम आपको उन जगहों पर ले चलेंगे जो खास हैं। विज्ञान व तर्क की कसौटी पर इन जगहों को अंधविश्वास से जोड़ा जाता है, लेकिन कुछ तो है जिससे करोड़ों लोग हर साल यहां खिंचे चले आते हैं। लोग आते हैं, अपनी अर्जियां लगाते हैं और मनौतियां पूरी होने पर मत्था टेकने भी आते हैं। अब अगर आप इन जगहों को खारिज करना चाहते हैं तो टेस्ट लेना सबसे मुनासिब तरीका होगा। आउटिंग की आउटिंग भी हो जाएगी और सच्चाई का पता भी चल जाएगा।

लीजिए डिजिटल रोमांटिक टूर का मजा

बेहतरीन लाइट्स, शानदार म्यूजिक और कमाल की कारीगरी का सेलिब्रेशन, फ्रैंकफर्ट ल्यूमिनाले इस साल लॉकडाउन की वजह से अभी तक नहीं हो पाया था। यह उत्सव 2002 से हर दो साल में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में होता है जिसमें लगभग 250,000 लोग हिस्सा लेते हैं। इस साल कोरोना वायरस की वजह से यहां की रोशनी भी फीकी होती दिख रही थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।ल्यूमिनाले 2020 इस बार डिजिटल होगा क्योंकि इसमें शामिल होने वाले कलाकारों ने कोरोना वायरस के महामारी घोषित होने से पहले ही अपने प्रोजेक्ट्स बना लिए थे। आप भले ही करीब जाकर इन प्रोजेक्ट्स का मजा नहीं ले सकते लेकिन डिजिटली आप अभी भी इस साल के प्रोजेक्ट्स का पूरा मजा ले सकते हैं। #Luminaledigital एक वर्चुअल टूर है जिसमें आप बिहाइंड द सीन्स का टूर भी कर सकते हैं।इस साल के ल्यूमिनाले उत्सव की थीम डिजिटल रोमांटिक है जिसमें कला के रोमांटिक दौर और डिजिटल रिवॉल्यूशन के बारे में प्रोजेक्टस बनाए गए हैं। वास्तविक दुनिया से परे पहुंचने के लिए इसमें लाइट्स का इस्तेमाल किया जाता है। यह इन जगहों को डिजिटल दुनिया में ले जाता है और बहस छेड़ता है कि क्या इनकी वाकई में जरूरत है? ल्यूमिनाले पूछता है, क्या डिजिटल वाकई एनॉलॉग कंटेंट को समझाने का बेहतर समाधान है? क्या लगातार आने वाली चीजों की बाढ़ का सामना करने के लिए दिमाग में नई तस्वीरें बनाई जा सकती हैं? क्या रोशनी की कला एक स्टेज इवेंट तक आकर खत्म हो जाती है? या क्या यह सच्चे, सुंदर, अच्छे के लिए एक तड़प को पूरा करती है? अगर आप भी रोशनी और संवाद के एक बेहतरीन अनुभव में खुद को खोना चाहते हैं और इस आभासी दुनिया में शामिल होना चाहते हैं तो ल्यूमिनाले की वेबसाइट पर जाइए और इसका मजा लीजिए।

फिजाओं में चार चांद लगाता राजस्थान का माउंट आबू फेस्टिवल

राजस्थान जितना खूबसूरत है, यहां की गर्मी उतनी ही खतरनाक भी है। कई टूरिस्ट तो यहां कि गर्मी के चलते घूमने का प्लान बनाने से पहले सौ बार सोचते हैं, लेकिन आपको बता दें रेत से घिरे इस रंग-रंगीले राज्य में एक हिल स्टेशन भी है। यह राजस्थान के सिरोही जिले में है, जिसे माउंट आबू नाम से जाना जाता है। माउंट आबू बेहद ही आकर्षक जगह है, जो टूरिस्ट को अपनी ओर खींच ही लेती है। यहां आने की एक खास वजह और है जिसके चलते देश-दुनिया से यहां टूरिस्ट पहुंचते हैं। दिसंबर के महीने में माउंट आबू विंटर फेस्टिवल आयोजित होता है। इस दौरान आपको यहां राजस्थान की संस्कृति के विविध रंग दिखाई देंगे। यह फेस्टिवल यहां राजस्थान सरकार, पर्यटन विभाग, म्युनिसिपल बोर्ड आदि की ओर से आयोजित किया जाता है। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा खेलकूद, कठपुतली नृत्य, डॉग शो, बोट रेस, योग और ध्यान जैसी गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।माउंट आबू अपने प्राचीन इतिहास और ऐतिहासिक महत्व वाली जगहों के चलते टूरिस्ट के आकर्षण का केन्द्र है। माउंट आबू विंटर फेस्टिवल में यहां का माहौल बिलकुल बदला नजर आता है। दरअसल, यह फेस्टिवल यहां के स्थानीय पर्वतीय लोगों के सामूहिक जश्न का प्रतीक है। इसमें होने वाले रंगारंग कार्यक्रम यहां की फिजाओं में चार चांद लगा देते हैं। रंग-बिरंगे पारम्परिक राजस्थानी परिधानों में यहां की स्थानीय जनजातियां सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जान फूंक देती हैं। करीने से सजाए गए ऊंट, घोड़े, हाथी पर्यटकों को रोमांच से भर देते हैं। आबू रोड बस स्टैंड से लेकर नक्की झील तक यहां जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। यहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं जैसे मटका फोड़, रंगोली, म्यूजिकल चेयर, रस्साकशी होती रहती हैं। शाम को विशेष रंगारंग कार्यक्रम होते हैं, जिसमें दर्शकों की बड़ी तादाद उमड़ती है। माउंट आबू राजस्थान की एक अलग झलक पेश करता है।

कोर्णाक डांस फेस्टिवल : झूमकर नाचिए और डूब जाइए भक्ति के रंग में

ठंड ने पूरी तरह से देश के अधिकतर हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इसी के साथ देश में कुछ ऐसे विंटर फेस्टिवल्स भी शुरू हो जाएंगे, जो लोक-संस्कृति और कलाओं के अनोखे उदाहरण पेश करते हैं। ग्रासहॉपर के इस अंक में हम आपको देश के कुछ प्रसिद्ध विंटर फेस्टिवल्स के बारे में बताएंगे, जहां जाकर आप विभिन्न संस्कृतियों और विधाओं के बारे में जान पाएंगे, साथ ही कुछ बेहतरीन पलों का भी मजा ले सकते हैं।

पुष्कर: उत्सवों को उत्साह से मनाती भगवान ब्रह्मा की ये नगरी

अरावली की पहाड़ियों से तीन ओर से घिरे राजस्थान के ह्रदय पुष्कर में एक अलग ही रंग का हिंदुस्तान बसता है। एक ऐसा हिंदुस्तान जिसे सैलानी सिर्फ देखने नहीं बल्कि उसे महसूस करने, जीने और इसकी आध्यात्मिकता में डूब जाने के लिए आते हैं। आपके लिए ये बेस्ट मौका है पुष्कर घूमने का, क्योंकि 15 नवंबर से 23 नवंबर तक यहां पूरी दुनिया में अपनी तरह का इकलौता पुष्कर मेला लगने जा रहा है। हां उछलते हुए ऊंट दौड़ लगाते हों, जहां राजस्थानी बांकुरे मूंछों पर ताव देते हुए डूबते सूरज के धुंधलके को आंखों में समेट लेते हों और जहां सिर पर रंग-बिरंगा साफा बांधे थिरकते सैलानी महोत्सव को जश्न में बदल देते हों, उस खूबसूरत नगरी का नाम है पुष्कर। श्रृष्टि रचयिता, सभी वेदों के निर्माता, स्वयंभु और परमपिता ब्रह्मा की यह नगरी मन में उत्साह का नया संचार करती है। यूं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड ही परमपिता का घर है लेकिन पृथ्वी के बारे में कहा जाता है कि यहां एक जगह ऐसी भी है, जिसे भगवान ब्रह्मा का पृथ्वी का घर कहा जाता है, उस जगह का नाम है तीर्थराज पुष्कर। वही पुष्कर जिसे विश्व में एकमात्र ब्रह्मा मंदिर होने का सौभाग्य प्राप्त है। तो चलिए ग्रासहॉपर के साथ दिल्ली से लगभग 414 किमी और जयपुर से 130 किलोमीटर दूर बसे इस शहर की खुशबू को समेटने...

सेंट वैलेनटाइन का गांव जिसे कहते हैं 'विलेज ऑफ लव'

हफ्ता मोहब्बत वाला जिसका जश्न मनाने के लिए लाखों दिल धड़कते हैं। वैलेनटाइंस डे पर अनगिनत प्रेम कहानियां शुरू होती हैं और वक्त के साथ परवान चढ़ती हैं। लेकिन जिसकी वजह से मोहब्बत वाले इस हफ्ते में युवाओं का दिल धड़कता है क्या उसके बारे में आप जानते हैं? क्या उसके गांव के बारे में जानते हैं और क्या उसके त्याग के बारे में जानते हैं। तो आइए हम आपको बताते हैं सेंट वैलेनटाइन और उनके गांव के बारे में जो हर साल 12 से 14 फरवरी के बीच सैंकड़ों कपल्स के प्रेम का गवाह बनता है।यह गांव लॉयर वैली में स्थित है, जिसका नाम है सेंट वैलेनटाइन। यदि आपको लगता है कि पेरिस दुनिया के सबसे रोमांटिक शहरों में से है तो एक बार लॉयर वैली के सेंट वैलेनटाइन गांव जरूर घूम आइए। यहां हवाओं में प्यार आप जरूर महसूस कर पाएंगे। खैर अब आते हैं सेंट वैलेनटाइन के इतिहास पर। दरअसल, सम्राट क्लॉडियस का मानना था कि अविवाहित पुरुष विवाहित पुरुषों की तुलना में ज्यादा अच्छे सैनिक बन सकते हैं। यही वजह है उसने अपने राज्य में सैनिकों व अधिकारियों के शादी करने पर पाबंदी लगा दी थी। उसी दौरान संत वैलेनटाइन एक चर्च में पादरी थे और उन्होंने इस आदेश को मानने से मना कर दिया और इसका विरोध किया। संत वैलेनटाइन ने सम्राट के आदेश के खिलाफ कई सैनिकों और अधिकारियों के गुप्त विवाह भी करवाए। इस बात के बारे में जब क्लॉडियस को पता चला तो उन्होंने संत वैलेनटाइन को फांसी पर चढ़ा दिया। यह फांसी 14 फरवरी 269 के दिन दी गई। तभी से यह दिन वैलेनटाइंस डे के रूप में प्रचलित हो गया। बताया जाता है कि वैलेनटाइन ने अपनी मौत के समय जेल की अंधी बेटी जैकोबस को अपनी आंखें दान कर दी थीं। साथ ही उन्होंने जैकोबस को एक चिट्ठी भी दी, जिसके आखिर में लिखा था Your Valentine. यही से लोगों में अपने प्रिय लोगों के प्रति वैलेनटाइन कहने की परंपरा की शुरुआत हुई। 

दुर्गा पूजा: शक्ति व शौर्य का उत्सव

आस्था, भक्ति, शक्ति व शौर्य का प्रतीक त्योहार यानि दुर्गा पूजा। उत्सव भले एक हो लेकिन इसका रंग हर राज्य में थोड़ा अलग देखने को मिलेगा। कहीं इन नौ दिनों में उपवास रखा जाता है तो कहीं नाच गाकर मां दुर्गा को खुश करने की कोशि। आस्था और उल्लास दोनों का मेल है दुर्गा पूजा। यूपी, झारखंड, गुजरात, हिमाचल, महाराष्ट्र और सबसे खास बंगाल में ये त्योहार बड़े ही भव्य तरीके से मनाया जाता है। तो इस बार आप भी इस उत्सव के भक्ति रंग में खुद को सराबोर करने के लिए निकल पड़िए इनमें से ही किस एक राज्य में।

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