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श्राद्ध पक्ष में इन जगहों का है विशेष महत्व, पिंडदान के लिए जाते हैं लोग

भारत में भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष की शुरुआत होती है। पितृपक्ष 15 दिन चलता है यानी अश्विन महीने की अमावस्या तक। इस साल यह 20 सितंबर से शुरू होकर 6 अक्टूबर तक चलेगा और 7 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू हो जाएंगे। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। देश में ऐसी कई जगहें हैं जो पूर्वजों जहां जाकर लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। आप भी जानिए इन जगहों के बारे में...

खूबसूरत नक्काशी और गर्वीला इतिहास है इस जगह की पहचान

दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में एक छोटा सा शहर है हम्पी। विजयनगर का यह शहर भले ही छोटा सा है, लेकिन इसका नाम यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है। कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहा हम्पी आज भी अपनी कमाल की नक्काशी वाले मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। 

यहां माथा टेककर पूरी होगी मन की हर मुराद

क्यों सर जी! कोरोना ने गर्मी की छुट्टियों का कबाड़ा कर दिया न। आप ही नहीं, हर किसी के साथ ऐसा ही हुआ है। लोगों ने जो कुछ भी प्लान बनाया था, वह रेत के टीले की तरह भरभरा कर ढह गया। अब तो सारी कोशिशें जान बचाने की हैं। खैर जैसे यह वक्त आया है, देर-सवेर चला भी जाएगा। इस दौर के गुजरने के बाद आपको कहीं निकलना हो तो हमारे पास आपके लिए कुछ खास है। आज हम आपको उन जगहों पर ले चलेंगे जो खास हैं। विज्ञान व तर्क की कसौटी पर इन जगहों को अंधविश्वास से जोड़ा जाता है, लेकिन कुछ तो है जिससे करोड़ों लोग हर साल यहां खिंचे चले आते हैं। लोग आते हैं, अपनी अर्जियां लगाते हैं और मनौतियां पूरी होने पर मत्था टेकने भी आते हैं। अब अगर आप इन जगहों को खारिज करना चाहते हैं तो टेस्ट लेना सबसे मुनासिब तरीका होगा। आउटिंग की आउटिंग भी हो जाएगी और सच्चाई का पता भी चल जाएगा।

लीजिए डिजिटल रोमांटिक टूर का मजा

बेहतरीन लाइट्स, शानदार म्यूजिक और कमाल की कारीगरी का सेलिब्रेशन, फ्रैंकफर्ट ल्यूमिनाले इस साल लॉकडाउन की वजह से अभी तक नहीं हो पाया था। यह उत्सव 2002 से हर दो साल में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में होता है जिसमें लगभग 250,000 लोग हिस्सा लेते हैं। इस साल कोरोना वायरस की वजह से यहां की रोशनी भी फीकी होती दिख रही थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।ल्यूमिनाले 2020 इस बार डिजिटल होगा क्योंकि इसमें शामिल होने वाले कलाकारों ने कोरोना वायरस के महामारी घोषित होने से पहले ही अपने प्रोजेक्ट्स बना लिए थे। आप भले ही करीब जाकर इन प्रोजेक्ट्स का मजा नहीं ले सकते लेकिन डिजिटली आप अभी भी इस साल के प्रोजेक्ट्स का पूरा मजा ले सकते हैं। #Luminaledigital एक वर्चुअल टूर है जिसमें आप बिहाइंड द सीन्स का टूर भी कर सकते हैं।इस साल के ल्यूमिनाले उत्सव की थीम डिजिटल रोमांटिक है जिसमें कला के रोमांटिक दौर और डिजिटल रिवॉल्यूशन के बारे में प्रोजेक्टस बनाए गए हैं। वास्तविक दुनिया से परे पहुंचने के लिए इसमें लाइट्स का इस्तेमाल किया जाता है। यह इन जगहों को डिजिटल दुनिया में ले जाता है और बहस छेड़ता है कि क्या इनकी वाकई में जरूरत है? ल्यूमिनाले पूछता है, क्या डिजिटल वाकई एनॉलॉग कंटेंट को समझाने का बेहतर समाधान है? क्या लगातार आने वाली चीजों की बाढ़ का सामना करने के लिए दिमाग में नई तस्वीरें बनाई जा सकती हैं? क्या रोशनी की कला एक स्टेज इवेंट तक आकर खत्म हो जाती है? या क्या यह सच्चे, सुंदर, अच्छे के लिए एक तड़प को पूरा करती है? अगर आप भी रोशनी और संवाद के एक बेहतरीन अनुभव में खुद को खोना चाहते हैं और इस आभासी दुनिया में शामिल होना चाहते हैं तो ल्यूमिनाले की वेबसाइट पर जाइए और इसका मजा लीजिए।

फिजाओं में चार चांद लगाता राजस्थान का माउंट आबू फेस्टिवल

राजस्थान जितना खूबसूरत है, यहां की गर्मी उतनी ही खतरनाक भी है। कई टूरिस्ट तो यहां कि गर्मी के चलते घूमने का प्लान बनाने से पहले सौ बार सोचते हैं, लेकिन आपको बता दें रेत से घिरे इस रंग-रंगीले राज्य में एक हिल स्टेशन भी है। यह राजस्थान के सिरोही जिले में है, जिसे माउंट आबू नाम से जाना जाता है। माउंट आबू बेहद ही आकर्षक जगह है, जो टूरिस्ट को अपनी ओर खींच ही लेती है। यहां आने की एक खास वजह और है जिसके चलते देश-दुनिया से यहां टूरिस्ट पहुंचते हैं। दिसंबर के महीने में माउंट आबू विंटर फेस्टिवल आयोजित होता है। इस दौरान आपको यहां राजस्थान की संस्कृति के विविध रंग दिखाई देंगे। यह फेस्टिवल यहां राजस्थान सरकार, पर्यटन विभाग, म्युनिसिपल बोर्ड आदि की ओर से आयोजित किया जाता है। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा खेलकूद, कठपुतली नृत्य, डॉग शो, बोट रेस, योग और ध्यान जैसी गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।माउंट आबू अपने प्राचीन इतिहास और ऐतिहासिक महत्व वाली जगहों के चलते टूरिस्ट के आकर्षण का केन्द्र है। माउंट आबू विंटर फेस्टिवल में यहां का माहौल बिलकुल बदला नजर आता है। दरअसल, यह फेस्टिवल यहां के स्थानीय पर्वतीय लोगों के सामूहिक जश्न का प्रतीक है। इसमें होने वाले रंगारंग कार्यक्रम यहां की फिजाओं में चार चांद लगा देते हैं। रंग-बिरंगे पारम्परिक राजस्थानी परिधानों में यहां की स्थानीय जनजातियां सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जान फूंक देती हैं। करीने से सजाए गए ऊंट, घोड़े, हाथी पर्यटकों को रोमांच से भर देते हैं। आबू रोड बस स्टैंड से लेकर नक्की झील तक यहां जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। यहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं जैसे मटका फोड़, रंगोली, म्यूजिकल चेयर, रस्साकशी होती रहती हैं। शाम को विशेष रंगारंग कार्यक्रम होते हैं, जिसमें दर्शकों की बड़ी तादाद उमड़ती है। माउंट आबू राजस्थान की एक अलग झलक पेश करता है।

कोर्णाक डांस फेस्टिवल : झूमकर नाचिए और डूब जाइए भक्ति के रंग में

ठंड ने पूरी तरह से देश के अधिकतर हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इसी के साथ देश में कुछ ऐसे विंटर फेस्टिवल्स भी शुरू हो जाएंगे, जो लोक-संस्कृति और कलाओं के अनोखे उदाहरण पेश करते हैं। ग्रासहॉपर के इस अंक में हम आपको देश के कुछ प्रसिद्ध विंटर फेस्टिवल्स के बारे में बताएंगे, जहां जाकर आप विभिन्न संस्कृतियों और विधाओं के बारे में जान पाएंगे, साथ ही कुछ बेहतरीन पलों का भी मजा ले सकते हैं।

पुष्कर: उत्सवों को उत्साह से मनाती भगवान ब्रह्मा की ये नगरी

अरावली की पहाड़ियों से तीन ओर से घिरे राजस्थान के ह्रदय पुष्कर में एक अलग ही रंग का हिंदुस्तान बसता है। एक ऐसा हिंदुस्तान जिसे सैलानी सिर्फ देखने नहीं बल्कि उसे महसूस करने, जीने और इसकी आध्यात्मिकता में डूब जाने के लिए आते हैं। आपके लिए ये बेस्ट मौका है पुष्कर घूमने का, क्योंकि 15 नवंबर से 23 नवंबर तक यहां पूरी दुनिया में अपनी तरह का इकलौता पुष्कर मेला लगने जा रहा है। हां उछलते हुए ऊंट दौड़ लगाते हों, जहां राजस्थानी बांकुरे मूंछों पर ताव देते हुए डूबते सूरज के धुंधलके को आंखों में समेट लेते हों और जहां सिर पर रंग-बिरंगा साफा बांधे थिरकते सैलानी महोत्सव को जश्न में बदल देते हों, उस खूबसूरत नगरी का नाम है पुष्कर। श्रृष्टि रचयिता, सभी वेदों के निर्माता, स्वयंभु और परमपिता ब्रह्मा की यह नगरी मन में उत्साह का नया संचार करती है। यूं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड ही परमपिता का घर है लेकिन पृथ्वी के बारे में कहा जाता है कि यहां एक जगह ऐसी भी है, जिसे भगवान ब्रह्मा का पृथ्वी का घर कहा जाता है, उस जगह का नाम है तीर्थराज पुष्कर। वही पुष्कर जिसे विश्व में एकमात्र ब्रह्मा मंदिर होने का सौभाग्य प्राप्त है। तो चलिए ग्रासहॉपर के साथ दिल्ली से लगभग 414 किमी और जयपुर से 130 किलोमीटर दूर बसे इस शहर की खुशबू को समेटने...

सेंट वैलेनटाइन का गांव जिसे कहते हैं 'विलेज ऑफ लव'

हफ्ता मोहब्बत वाला जिसका जश्न मनाने के लिए लाखों दिल धड़कते हैं। वैलेनटाइंस डे पर अनगिनत प्रेम कहानियां शुरू होती हैं और वक्त के साथ परवान चढ़ती हैं। लेकिन जिसकी वजह से मोहब्बत वाले इस हफ्ते में युवाओं का दिल धड़कता है क्या उसके बारे में आप जानते हैं? क्या उसके गांव के बारे में जानते हैं और क्या उसके त्याग के बारे में जानते हैं। तो आइए हम आपको बताते हैं सेंट वैलेनटाइन और उनके गांव के बारे में जो हर साल 12 से 14 फरवरी के बीच सैंकड़ों कपल्स के प्रेम का गवाह बनता है।यह गांव लॉयर वैली में स्थित है, जिसका नाम है सेंट वैलेनटाइन। यदि आपको लगता है कि पेरिस दुनिया के सबसे रोमांटिक शहरों में से है तो एक बार लॉयर वैली के सेंट वैलेनटाइन गांव जरूर घूम आइए। यहां हवाओं में प्यार आप जरूर महसूस कर पाएंगे। खैर अब आते हैं सेंट वैलेनटाइन के इतिहास पर। दरअसल, सम्राट क्लॉडियस का मानना था कि अविवाहित पुरुष विवाहित पुरुषों की तुलना में ज्यादा अच्छे सैनिक बन सकते हैं। यही वजह है उसने अपने राज्य में सैनिकों व अधिकारियों के शादी करने पर पाबंदी लगा दी थी। उसी दौरान संत वैलेनटाइन एक चर्च में पादरी थे और उन्होंने इस आदेश को मानने से मना कर दिया और इसका विरोध किया। संत वैलेनटाइन ने सम्राट के आदेश के खिलाफ कई सैनिकों और अधिकारियों के गुप्त विवाह भी करवाए। इस बात के बारे में जब क्लॉडियस को पता चला तो उन्होंने संत वैलेनटाइन को फांसी पर चढ़ा दिया। यह फांसी 14 फरवरी 269 के दिन दी गई। तभी से यह दिन वैलेनटाइंस डे के रूप में प्रचलित हो गया। बताया जाता है कि वैलेनटाइन ने अपनी मौत के समय जेल की अंधी बेटी जैकोबस को अपनी आंखें दान कर दी थीं। साथ ही उन्होंने जैकोबस को एक चिट्ठी भी दी, जिसके आखिर में लिखा था Your Valentine. यही से लोगों में अपने प्रिय लोगों के प्रति वैलेनटाइन कहने की परंपरा की शुरुआत हुई। 

दुर्गा पूजा: शक्ति व शौर्य का उत्सव

आस्था, भक्ति, शक्ति व शौर्य का प्रतीक त्योहार यानि दुर्गा पूजा। उत्सव भले एक हो लेकिन इसका रंग हर राज्य में थोड़ा अलग देखने को मिलेगा। कहीं इन नौ दिनों में उपवास रखा जाता है तो कहीं नाच गाकर मां दुर्गा को खुश करने की कोशि। आस्था और उल्लास दोनों का मेल है दुर्गा पूजा। यूपी, झारखंड, गुजरात, हिमाचल, महाराष्ट्र और सबसे खास बंगाल में ये त्योहार बड़े ही भव्य तरीके से मनाया जाता है। तो इस बार आप भी इस उत्सव के भक्ति रंग में खुद को सराबोर करने के लिए निकल पड़िए इनमें से ही किस एक राज्य में।

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