यमुना के किनारे पर कुछ खजानों का सफ़र
उत्तराखंड के चंपासर ग्लेशियर से निकलकर हरियाणा, दिल्ली से होती हुई 1367 किलोमीटर का सफर तय करते हुए यमुना नदी प्रयागराज के संगम में गंगा नदी में समाहित हो जाती है। गंगा की सहायक नदियों में सबसे लम्बी यमुना ही है। लाखों लोगों को जीवन देने वाली इस नदी का नाम अक्सर लोगों की जुबान पर चढ़ा रहता है। कभी इसमें बढ़ते प्रदूषण की चर्चा होती है तो कभी ये खुद को पर्यावरणीय चुनौतियों और शहरीकरण की बुराइयों से जुडी चर्चाओं में उलझा हुआ पाती है। फ़िलहाल यमुना में पानी का स्तर काफी ज़्यादा बढ़ने से दिल्ली और कई पड़ोसी शहरों और गांवों में तबाही मची हुई है।
हालांकि, हम आपको इन बोझिल ख़बरों में नहीं उलझाएंगे और आपको इसके किनारों की सैर कराएंगे। यमुना नदी के किनारे पर ऐसी कई जगहें बसी और बनी हैं जो पूरी दुनिया में मशहूर हैं। हो सकता है कि आप इनके बारे में जानते हों लेकिन फिर भी एक बार हमारे साथ चलिए यमुना के किनारे-किनारे एक खूबसूरत से सफर पर…
ताजमहल, आगरा
ताजमहल और यमुना का किनारा जैसे एक दूसरे के पूरक हैं। इस जगह पर आओ तो ऐसा लगता है कि एक के बिना दूसरे की खूबसूरती अधूरी है। आगरा में यमुना के किनारे सफेद संगमरमर की ये अद्भुत इमारत दुनिया के सात अजूबों में शामिल होने के साथ ही एक यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी है। जब आप ताजमहल के गलियारे में टहलते हुए इसके पीछे बहने वाली यमुना नदी को देखते हैं तो मन में ख्याल आता है जैसे दफन हो चुकी मोहब्बत की निशानी के साथ कई ज़िंदगियों की कहानी पानी के साथ बह रही हो।
एतिमाद- उद-दौला, आगरा
आगरा छावनी रेलवे स्टेशन से 8 किमी और आगरा किले से 3 किमी की दूरी पर, एतिमाद- उद-दौला का मकबरा आगरा में यमुना ब्रिज रेलवे स्टेशन के पास यमुना नदी के पश्चिमी तट पर बना है। मकबरे को ज्वेल बॉक्स या बेबी ताज के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह मकबरा ही ताज महल के निर्माण की प्रेरणा था। एतिमाद- उद-दौला भारत का पहला स्मारक है जो पूरी तरह से संगमरमर से बनाया गया है। इस मकबरे को 1622 और 1628 के बीच जहांगीर की रानी नूरजहां ने अपने पिता मिर्जा गियास की याद में करवाया था। मिर्ज़ा गियास एक शाही अधिकारी थे और उन्हें सम्राट जहांगीर ने एतिमाद- उद-दौला (राज्य का स्तंभ) की पदवी से नवाज़ा था। यह मकबरा सफेद संगमरमर की पच्चीकारी और जाली से बनाया गया है। इस मकबरे के ठीक पीछे यमुना नदी बहती है। बारिश के समय अगर आप यहां जाएंगे तो एतिमाद- उद-दौला के मकबरे के साथ यमुना की खूबसूरती देखकर अचंभित हो जाएंगे। इसके पीछे बने दालान में बैठकर आप घंटों यमुना को बहते हुए देख सकते हैं। कई बार यहां कुछ बच्चे भी आपको ऊंचाई पर चढ़कर यमुना में कूदकर तैराकी करते हुए दिख जाएंगे।
लाल किला, दिल्ली
दिल्ली के लाल किले को 1648 में पांचवें मुगल सम्राट शाहजहां ने बनवाया था। यह वो वक़्त था जब उन्होंने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला किया था। 256 एकड़ में फैले दिल्ली के लाल किला परिसर में बगले का पुराना किला सलीमगढ़ भी शामिल है, जिसे इस्लाम शाह सूरी ने 1546 में बनवाया था। इस विशाल दीवार वाली संरचना को पूरा होने में लगभग एक दशक (10 साल) का समय लगा था। शाहजहाँ के दरबार के उस्ताद हामिद और उस्ताद अहमद ने 1638 में निर्माण शुरू किया और 1648 में इसको पूरा किया। इस किले को यमुना नदी के तट पर बनवाया गया था जिसका पानी किले के चारों ओर की खाई में जाता था। अष्टकोणीय आकार का लाल किला अंग्रेजों के सत्ता में आने से पहले लगभग 200 वर्षों तक मुगल साम्राज्य की गद्दी बना रहा। वैसे तो विजस कहें या अतिक्रमण जिसकी वजह से अब यमुना लाल किले से दूर हो गई है, लेकिन इस साल की बाढ़ से वह फिर अपने पुराने रस्ते पर लौट आई है और लाल किले के पास बह रही है।
जामा मस्जिद, दिल्ली
जामा मस्जिद दिल्ली में सम्राट शाहजहां द्वारा बनवाई गई एक शानदार मस्जिद है। यह भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है, जिसमें एक समय में 25,000 लोग प्रार्थना कर सकते हैं। सेंट्रल दिल्ली के बीच में बानी ये मस्जिद इतनी खूबसूरत और सुकून से भरी है कि यहाँ आने वाले लोग इसमें खो से जाते हैं। शाहजहां ने शाहजहाँनाबाद के चारदीवारी वाले शहर में जामा मस्जिद बनवाई, जिसे आज पुरानी दिल्ली के नाम से जाना जाता है और यह सम्राट की राजशाही के दौरान मुग़ल साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। मस्जिद को बनाने में बारह साल लग गए। इसका निर्माण 1644 में शुरू हुआ और 1656 में पूरा हुआ। मस्जिद को शुरू में मस्जिद-ए-जहाँ नुमा कहा जाता था, जिसका मतलब है "वह मस्जिद जो दुनिया को प्रतिबिंबित करती है"। और फिर इसका नाम जामा मस्जिद या शुक्रवार मस्जिद रखा गया। मस्जिद का उद्घाटन 23 जुलाई 1656 को इमाम अब्दुल गफूर शाह बुखारी ने किया था। उन्हें शाहजहां ने बुखारा (अब उज्बेकिस्तान) से बुलाया था। शाहजहां ने उन्हें जामा मस्जिद का पहला शाही इमाम भी नियुक्त किया। वैसे तो अब जमा मस्जिद और यमुना के बीच काफी दूरी हो गयी है लेकिन एक वक़्त था जब मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाले लीग यमुना के पानी से वजू करते थे।
ओखला पक्षी विहार, गौतम बुद्ध नगर
ओखला पक्षी अभयारण्य, यमुना नदी पर ओखला बैराज पर एक बर्ड सैंचुरी है। यह नोएडा, गौतम बुद्ध नगर जिले में, दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा पर है और 300 से अधिक पक्षी प्रजातियों, विशेष रूप से जलपक्षियों के लिए एक स्वर्ग के रूप में जानी जाती है। 1990 में, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यमुना नदी पर 3।5 वर्ग किलोमीटर (1।4 वर्ग मील) के क्षेत्र को एक पक्षी अभयारण्य नामित किया गया था। यहीं से यमुना नदी उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है । अभयारण्य की सबसे प्रमुख विशेषता नदी पर बांध बनाकर बनाई गई बड़ी झील है, जो पश्चिम में ओखला गांव और पूर्व में गौतमबुद्धनगर के बीच है।
केशी घाट, वृन्दावन
यमुना नदी के तट पर स्थित जैसी घाट मथुरा, वृन्दावन में सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली जगहों में से एक है। यह घाट भगवान कृष्ण के भक्तों के बीच बहुत फेमस जगह है। केशी घाट को भरतपुर की रानी लक्ष्मी देवी ने 17वीं शताब्दी में बनवाया था। वृंदावन के लगभग हर प्राचीन मंदिर में पारंपरिक राजस्थानी स्थापत्य शैली दिखती है जिसमें विस्तृत ‘जाली’ का काम और विशिष्ट कमल और पुष्प डिजाइन हैं। यही हाल केसी घाट का भी है। हालांकि यह कोई मंदिर नहीं है, लेकिन घाट के किनारे आपको विशिष्ट राजस्थानी ‘कारीगरी’ या शिल्प कौशल दिखाई देगा। यमुना नदी की ओर जाने वाली सीढ़ियों के साथ, घाट शाम के समय लोगों से गुलजार रहता है।लोकप्रिय मान्यताओं के अनुसार, यह वह घाट है जहां भगवान कृष्ण ने केसी राक्षस का वध कर स्नान किया था।तब से, भक्त बड़ी संख्या में भगवान का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं। यहां रोज़ शाम को यमुना जी की आरती भी होती है।
प्रयागराज
यह वो जगह है जहां हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा का सफर तय करके यमुना पहुंचती है और खुद के अस्तित्व को संगम में विलीन करके गंगा को एक नयी ऊर्जा देती है। प्रयागराज के संगम की सुबहें और शामें दोनों ही बेहद खूबसूरत होती हैं।
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