दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर भारत का पहला वन्यजीव कॉरिडोर
जानवरों के लिए सुरक्षित रास्ता
प्रतीकात्मक तस्वीर
पर्यावरण की हिफाज़त का जज़्बा
इस कॉरिडोर में पर्यावरण का पूरा ख्याल रखा गया है। सड़क के दोनों ओर 4 मीटर ऊंची दीवारें बनाई गई हैं, जो जानवरों को सड़क पर आने से रोकती हैं। साथ ही, 2 मीटर ऊंचे साउंड बैरियर्स लगाए गए हैं, ताकि गाड़ियों का शोर जंगल के जानवरों को परेशान न करे। 35,000 पेड़ लगाए गए हैं, जो इस इलाके को और हरा-भरा बनाते हैं। बारिश का पानी बचाने के लिए हर 500 मीटर पर रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और ड्रिप इरिगेशन का इस्तेमाल किया गया है, जिससे पानी की बर्बादी 50% तक कम हुई है।
निर्माण में सावधानी
NHAI के क्षेत्रीय अधिकारी प्रदीप अत्री ने बताया कि इस कॉरिडोर को बनाना आसान नहीं था। निर्माण के दौरान हर 200 मीटर पर कर्मचारी तैनात थे, ताकि कोई जानवर निर्माण क्षेत्र में न आए और उसे नुकसान न पहुंचे। उनकी मेहनत कामयाब रही, और निर्माण के वक्त एक भी जानवर को हानि नहीं हुई। अब कैमरों में बाघ और रीछ इस कॉरिडोर से सुरक्षित पार करते दिखे हैं, जो इस प्रोजेक्ट की सफलता का सबूत है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
एक नई मिसाल
यह कॉरिडोर भारत में सड़क विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का शानदार उदाहरण है। रणथंभौर और चंबल घाटी जैसे जैव-विविधता वाले इलाकों में यह प्रोजेक्ट न सिर्फ जानवरों को सुरक्षित रखता है, बल्कि यात्रियों के लिए भी तेज़ और महफूज़ सफर देता है। यह 1,350 किलोमीटर लंबा दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे 2027 तक पूरा होगा, जो दिल्ली और मुंबई को जोड़ेगा। इस कॉरिडोर ने साबित किया कि तरक्की और प्रकृति साथ चल सकते हैं।
यात्रियों के लिए खास सलाह
अगर आप इस एक्सप्रेसवे से सफर करने की योजना बना रहे हो, तो रणथंभौर के पास इस कॉरिडोर को ज़रूर देखें। यह सिर्फ इंजीनियरिंग का कमाल नहीं, बल्कि दिखाता है कि हमारी सड़कें अब प्रकृति के साथ तालमेल रखकर बन रही हैं। रणथंभौर टाइगर रिजर्व में आप बाघ और अन्य जंगली जानवरों को उनके कुदरती माहौल में देख सकते हो। यह कॉरिडोर हमें सिखाता है कि विकास और प्रकृति का मेल संभव है। यह भारत के लिए गर्व का पल है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा भी।
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