एक छोटे से रेगिस्तान का सफर

अनुषा मिश्रा 15-06-2021 07:24 PM Soul Journey
नदियां, पहाड़, समंदर सब घूम चुके थे हम, अब मन था किसी रेगिस्तान के सफर का। रेत के टीलों के पीछे से उगते और डूबते सूरज को निहारने का। दिसम्बर, जनवरी में कोरोना का प्रकोप भी काफी हद तक कम हो चुका था तो सोचा कि क्यों न इस बार जैसलमेर के सफर पर निकला जाए, लेकिन जो आप सोचते हैं, वह पूरा हो जाए तो जिंदगी जन्नत ही न बन जाए? बहुत सारी प्लानिंग्स के बाद भी हमारा जैसलमेर जाने का ख्वाब पूरा न हो पाया। मन बड़ा ही दुखी था। इसलिए भी कि अब एक साल और इंतजार करना पड़ेगा दोबारा इस ख्वाहिश को मुकम्मल करने की जद्दोजहद के लिए, क्योंकि जनवरी के बाद जैसलमेर की गर्मी तो हम सह नहीं पाते। 

ख़ैर, इन सर्दियों को ऐसे तो नहीं जाने देना था तो सोचा कि क्यों न छोटे से रेगिस्तान का ही सफर कर लिया जाए। अब हमने तय किया कि हम अजमेर और पुष्कर तो घूम कर आएंगे ही। जयपुर से इस यात्रा को शुरू होना था। फरवरी महीने के एक शनिवार को सुबह हमने बैग पैक किए और निकल पड़े अजमेर के लिए। जयपुर से अजमेर का रास्ता शानदार है। वहां तक पहुंचने में हमें 2 घंटे का ही समय लगा, लेकिन पहुंचते-पहुंचते भूख लग गई थी तो सोचा कि पहले कुछ खा लिया जाए और फिर दरगाह में दर्शन किए जाएं। अजमेर शहर वैसे तो खूबसूरत है, पहाड़ियां हैं, झील है, लेकिन भीड़ बहुत है। पेट पूजा करने के बाद हमने दरगाह की ओर रुख किया।

गरीब नवाज़ की पनाह में

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अजमेर में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जिन्हें ग़रीब नवाज़ भी कहते हैं। दरगाह से लगभग दो किलोमीटर पहले से ही कई बड़ी पार्किंग शुरू हो जाती हैं जो पूरी कोशिश में रहते हैं कि आप हर हाल में गाड़ी उन्हीं की पार्किंग में पार्क करें, क्योंकि आगे के रास्ते पर गाड़ी ले जाना मना है और वहां भीड़ भी हद से ज्यादा होती है। दरगाह से लगभग एक किलोमीटर पहले एक पार्किंग में हमने गाड़ी लगाई और पैदल चलना शुरू किया। वाकई भीड़ इतनी थी कि रिक्शे भी न निकल पाएं। आने-जाने वालों की लंबी कतारें, सड़क के दोनों तरफ फूलों, चादरों, कपड़ों और हर तरह की न जाने कितनी दुकानें। लगभग 20 मिनट पैदल चलने के बाद हम दरगाह के दरवाज़े पर पहुंच चुके थे। दरवाज़े के दोनों तरफ ज़मीन पर कई लोग बैठे थे जो आपकी चप्पल लेकर आपको टोकन दे रहे थे। हमने भी उनमें से एक बुजुर्ग को अपनी चप्पलें दीं और टोकन लेकर आगे बढ़े। बड़ा सा प्रांगड़, उसके बाद कुछ सीढ़ियां, उसके बाद एक बरामदा और फिर से एक आंगन, आंगन में फूलों और चादरों की कई दुकानें, एक साइड में वजू करने और हाथ-पैर धोने के लिए नल लगे थे। हमने भी अपने हाथ पैर धोए और चादर पर फूलों की बड़ी सी टोकरी ली और मुख्य दरगाह की ओर बढ़ लिए। जिनके यहां से हमने फूल और चादर लिए थे, वही हमें वीआईपी दर्शन कराने वाले थे। मुख्य दरगाह के अंदर जाते ही जो बंदा लाइन लगवा रहा था, वो हमारी टोकरी देखकर ही समझ गया कि हमें दूसरे दरवाज़े से अंदर जाना है। छोटा सा दरवाज़ा था, सिर झुकाकर हम अंदर घुसे। हमारे साथ आए हुए महाशय ने हमसे वो टोकरी ली और खुद रेलिंग के अंदर चले गए। चादर चढ़ाई, फूल चढ़ाए, हमारे नाम पूछकर हमारे लिए दुआ की, हमें घर ले जाने के लिए दो धागे दिए और एक-एक कपड़ा भी ओढ़ाया। अपनी दुआ करने के बाद मैंने देखा कि जो लोग आम दरवाज़े से अंदर आ रहे थे, उन्हें ये सुविधा नहीं मिल रही थी। बस जल्दी से फूल चढ़ाओ और आगे बढ़ जाओ। हमने भी दूसरों का ज्यादा समय नहीं लिया और दुआ पढ़कर तुरंत बाहर निकल आए। 

बाहर बने बरामदे में कई महिलाएं और पुरुष बैठकर दुआ पढ़ रहे थे। ग़ज़ब की भीड़ थी, लेकिन उस भीड़ में एक सुकून था। लग रहा था कि बाबा के दर्शन करके मन की कई परेशानियां दूर हो गई हैं। कुछ तस्वीरें लेने के बाद हम दरगाह से वापस आ गए, इस उम्मीद के साथ कि शायद फिर कभी दोबारा यहां आने का मौका मिल जाए। बाहर निकलते ही न जाने कितने मांगने वाले हमारे पीछे पड़ गए थे। सोचा था कि आस-पास की दुकानों से थोड़ी सी शॉपिंग कर लेंगे लेकिन उन मांगने वालियों के चक्कर में इतनी तेज़ चलना पड़ रहा था कि पूछो मत, फिर भी उनमें से कई ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा। मेरे पति महोदय (हिमांशु) बड़े ही महान हैं, उन्होंने एक महिला को दो सौ का नोट निकाल कर दे दिया। बस उसके बाद जो कुछ लड़कियां हमारे पीछे पड़ीं, तो समझ लो पार्किंग तक पहुंचना मुश्किल हो गया। मुझे हिमांशु पर बहुत गुस्सा आ रहा था। गुस्सा इस बात का नहीं था कि पैसे दे दिए। गुस्सा इस बात का था कि जब इतने लोग मांग रहे हैं तो किसी एक को एक साथ दो सौ रुपये देने की क्या ज़रूरत थी। सबको थोड़ा-थोड़ा दे देते। एक तो जब उन लड़कियों ने देख लिया कि इस बंदे ने तो एक को ही इतने दे दिए, फिर तो उनका हमारे पीछे पड़ना लाजमी ही था। एक बात ये भी है कि मैं बच्चियों और हट्टी-कट्टे लोगों को भीख देने के बिल्कुल ख़िलाफ हूं। ख़ैर बेहद तेज़ कदमों से, बिना कोई शॉपिंग किए हम पार्किंग तक पहुंचे और वहां तक उन लड़कियों ने भी हमारा साथ दिया। गाड़ी में बैठ ही रहे थे कि एक शख़्स ने आकर हमारा नंबर लिया। उन्हें पता था कि हम अब पुष्कर ही जाएंगे और उन्होंने पुष्कर के लिए भी एक बंदा सेट कर दिया जो हमें पुष्कर में दर्शन कराता। बड़ी ही ग़ज़ब की सेटिंग है इन लोगों की। अजमेर से पुष्कर के लिए बढ़ने पर कुछ ही आगे एक बड़ी सी झील है। इसका नाम है आना सागर झील। इस झील को पृथ्वीराज चौहान के पितामह अरुणोराज या आणाजी चौहान ने बारहवीं शताब्दी के मध्य (1135-1150 ई.) बनवाया था। आणाजी द्वारा निर्मित करवाये जाने के कारण ही इस झील का नाम आणा सागर या आना सागर पड़ गया। ये झील बहुत सुंदर है। धूप काफी तेज़ थी लेकिन साइड में गाड़ी रोककर तस्वीरें लेना ज़रूरी था। हमने इस रिवाज़ को पूरा किया। कुछ मछलियों को दाना खिलाया और पुष्कर के लिए बढ़ गए।


तीर्थराज पुष्कर की ओर

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अजमेर से पुष्कर की दूरी करीब 12-13 किलोमीटर है। पूरा रास्ता अरावली की पहाड़ियों से घिरा है। गाड़ी में बैठे हुए फील तो पूरा हिमालय की पहाड़ियों वाला आता है लेकिन मौसम वैसा नहीं होता। हां, खूबसूरती में कोई कमी नहीं है। पहाड़ों पर बोगनविलिया के बड़े-बड़े पेड़ लगे थे, जो फूलों से ढके थे। कैक्टस भी खूब थे। आधे घंटे में हम पुष्कर पहुंच चुके थे। पुष्कर में एंट्री करने पर आपको 50 रुपये चार्ज देना होता है, लेकिन हमें अजमेर की पार्किंग में जो महोदय मिले थे, उन्होंने अपना लड़का वहां भेज दिया था। हमारी गाड़ी का नंबर उसके पास था। उसने हमारी गाड़ी को बिना पैसे दिए ही आगे जाने दिया और हमारे आगे-आगे अपनी बाइक पर चल पड़ा और सीधा ले जाकर हमें पुष्कर सरोवर के पास वाली गली में रोक दिया। हालांकि, हमारा ये तय प्रोग्राम नहीं था। ख़ैर हम पार्किंग में गाड़ी लगाकर उसके साथ सरोवर तक गए। वहां सीढ़ियों पर बैठकर उसने हमें पुष्कर की कथा सुनाई और पूजा कराने के लिए कहा। हम उस वक़्त पूजा नहीं करना चाहते थे। पुष्कर में हमें रुकना था, तो सोचा था कि सुबह-सुबह नहा-धोकर आराम से दर्शन और पूजा करेंगे। यही बात उसे बताकर हमने उससे विदा ली। 


तीन पहाड़ियों से घिरा शहर

तीन पहाड़ियों से घिरा पुष्‍कर शहर बेहद शांत है। सामान्‍य दिन पर इस शहर में बड़े आराम से पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है। लेकिन इसके बाज़ार के क्या कहने। कई किलोमीटर तक फैली गलियों में दोनों साइड दुकाने हैं। राजस्थानी कपड़ों की, सजावट के सामान की, विशेषकर विदेशियों के लिए बनाए गए कपड़ों और बाकी आइटम्स की। कचौड़ियों, लस्सी, तलवारों, ढालों न जाने किस-किस की। मतलब मेरी जैसी शॉपोहॉलिक बंदी के लिए तो जैसे जन्नत ही थीं ये गलियां। कुंड के प्रांगण से बाहर निकलने के बाद हमने एक गली में कुछ दूर चक्कर लगाया और ठंडी गुलाब पड़ी हुई लस्सी पी। राजस्‍थान के इस शहर को रोज गार्डन के नाम से जाना जाता है क्‍योंकि पुष्‍कर गुलाब के फूलों का दुनिया में सबसे बड़ा निर्यातक है। पुष्‍कर के फूलों की महक मन में कई दिनों तक बस जाती है। सुबह से निकले हुए थे तो थकान बहुत हो गई थी। सोचा कि पहले होटल खोज कर, फ्रेश होकर कुछ देर आराम की जाए फिर निकलेंगे घूमने के लिए। पर्यटकों की भीड़ कम थी, इसलिए हमें वाजिब दामों में एक अच्छा सा, बड़े से गार्डन वाला होटल पुष्कर सरोवर के पास ही मिल गया। होटल में फ्रेश होकर कुछ देर हमने आराम की। तब तक शाम हो चुकी थी। फिर हम पैदल ही सरोवर के पास टहलने और आरती के दर्शन के किए और निकल गए। सूरज बस ढलने ही वाला था। सरोवर के किनारे बनी राजपूतानी छतिरयों से ढलता हुआ सूरज और सरोवर का पानी अद्भुत लग रहा था। ये ऐसी जगह थी जहां तस्वीरें लेना तो बनता था। सरोवर में तैरती हुई बत्तखों के पास भी हमने कुछ तस्वीरें लीं। पीछे ही एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी। हीरो थे श्रेयस तलपड़े। हमें कहां शूूटिंग देखने में कोई रुचि थी तो हम आगे बढ़ गए। एक घाट से दूसरे घाट होते हुए, हम दोबारा बाज़ार वाली गलियों में पहुंच चुके थे। अब हमने यहां थोड़ी सी शॉपिंग की और फिर शाम को और भी खूबसूरत बनाने के लिए एक ठिकाना ढूंढना शुरू किया। पुष्कर में कई रूफ टॉप रेस्त्रां हैं। इनमें से एक में हम पहुंचे। सच बताऊं, मज़ा ही आ गया। वहां बैठकर, पूरा शहर दिख रहा था। सुंदर सा, जगमग करता हुआ। एक परफेक्ट हॉलीडे की शाम वाली फीलिंग को हमने वहां जी भरकर एंजॉय किया।

रात बढ़ रही थी तो सोचा कि अब वापस होटल का रुख किया जाए। होटल वाले ने गार्डन में हमारे लिए स्पेशल टेबल लगाकर डिनर सर्व किया। सबकुछ एकदम बेहतरीन था। तारों की छांव में नर्म घास पर पैर रखे हुए, ठंडी-ठंडी हवा में हमने खाना खाया। कुछ देर गार्डन में टहले और फिर सोने की तैयारी। अगले दिन हमें डेजर्ट सफारी करनी थी।


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मिनी रेगिस्तान का मज़ा

जैसलमेर न जाने की जो एक पीड़ा थी मन में, उसे कुछ कम करने के लिए हमने पुष्कर में ही डेजर्ट सफारी करने का प्लान बनाया था। लेकिन सुबह हम पहले सरोवर पर गए। वहां एक पंडित जी ने हमसे पूजा कराई और दक्षिणा न लेकर भी अच्छी-खासी रकम ट्रस्ट में जमा करा ली। हां, उन्होंने हमें प्रसाद दिया और पुष्कर का बना एक पैकेट गुलंकद भी। इसके बाद हमें दुनिया के इकलौते ब्रह्मा जी के मंदिर में दर्शन करने थे। ब्रह्मा जी को श्राप मिला था कि उनकी कहीं पूजा नहीं होगी तो इस मंदिर में भी उनकी आरती और पूजा नहीं होती। सिर्फ दर्शन ही होते हैं। ब्रह्मा जी के दर्शन करने के बाद हमने फिर से बाकी की जो लिस्ट बनाई थी, उसके हिसाब से शॉपिंग की। भई, घर वालों के लिए भी तो कुछ न कुछ लेकर आना था। यहां से घूम-घाम कर हम पहुंचे होटल और वहां से चेक आउट करके निकल पड़े डेजर्ट सफारी के ठिकाने की ओर। पतली गलियों और काफी ढलान वाले रास्तों से होकर आखिर हम रेगिस्तान के छोर पर पहुंच गए। वहां सफारी कराने वालों ने अपने टेंट लगा रखे थे, जहां से आगे हमें जीप या ऊंट से जाना था। मेरा मन तो ऊंट से जाने का ही था लेकिन उसने हमें जीप सफारी के लिए तैयार कर लिया। जीप में पीछे बैठकर, खुद को पूरी तरह दुपट्टे से लपेट कर हम एक एडवेंचरस सफर के लिए तैयार थे। रेत के ऊंचे-नीचे टीलों पर जीप वाला इतनी तेजी से जीप चला रहा था कि हमें लग रहा था हम उड़ ही जाएंगे। रेत हमारे कपड़ों और बालों में पूरी तरह भर चुका था, लेकिन मज़ा पूरा आ रहा था। बीच में एक जगह ले जाकर उसने जीप कुछ देर के लिए रोकी। यहां कुछ ऊंट वाले भी थे। तो हमने सोचा कि क्यों न ऊंट की सवारी का भी आनंद ले लिया जाए, ये कमी क्यों छोड़ दें। तो ये ख्वाहिश पूरी करके हम एक बार फिर जीप में सवार थे। उसने हमें रोज़ गार्डन, म्यूजियम और बाकी कई जगहों की सैर अपनी जीप से कराई और लगभग एक घंटे बाद हमें वापस उसी ठिकाने पर लाकर छोड़ दिया, जहां हमारी गाड़ी खड़ी थी।

पुष्कर का ये सफर हमारा यहीं पूरा हो गया। रेत को जितना झाड़ सकते थे, उतना खुद को साफ करके हम वापस जयपुर की तरफ चल पड़े। मन बहुत खुश था कि आखिर छोटा ही सही लेकिन अब रेगिस्तान भी घूम ही लिया है। 

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