मोगली और शेरखान के अड्डे की सैर

टीम ग्रासहॉपर 21-06-2022 12:37 PM Eco Tourism
नीरज अंबुज

ऐसा कहा जाता है कि रुडयार्ड किपलिंग की ‘जंगल बुक’ कान्हा नेशनल पार्क पर आधारित है। यहां दूर तक फैले घास के मैदान, साल और बांस के घनघोर जंगल,  उछलते-कूदते बारहसिंघे, ताल किनारे पानी पीते हिरण, पक्षियों के झुरमुट, जंगली भैंसे, अजगर, लंगूर, भालू, हाथी जंगल बुक के सारे किरदार आंखों के सामने उतर आते हैं।
एक दिन अचानक नीरज पाहुजा जी का फोन आया। उन्होंने कान्हा नेशनल पार्क चलने को कहा। मैंने आधा घंटा मांगा और दस मिनट में ही हामी भर दी। पाहुजा जी पर्यटन अधिकारी हैं। अभी तक उनसे ख़बरों के सिलसिले में ही बात होती थी। पहली बार घूमने जा रहे थे। वन्यजीवों से उन्हें विशेष लगाव है। देश के ज्यादातर नेशनल पार्क घूम चुके हैं। दुधवा के तो लॉकडाउन में चार राउंड लगा चुके हैं। इनके पास जंगल की एक से बढ़कर एक दिलचस्प कहानियां हैं। लखनऊ से हम दोनों साथ में निकले। इलाहाबाद में एक साथी जितेन्द्र सिंह को लेना था। उम्र 50 साल, लेकिन चेहरे की रौनक से 35-40 से ज्यादा नहीं लगते हैं। बेहद सरल और सौम्य। वह हद दर्जे के सकारात्मक आदमी और बनारस के बड़े ट्रेवल एजेंट हैं। पिछले तीस वर्षों से फील्ड में सक्रिय हैं।

हम लखनऊ से इलाहाबाद पहुंचे। रात होटल में गुजारी। जितेन्द्र सिंह से मिले। सुबह आठ बजे इलाहाबाद से रीवा, मैहर, कटनी, जबलपुर होते हुए कान्हा नेशनल पार्क पहुंचे। कान्हा मध्य प्रदेश के मंडला जिले में पड़ता है। यहां पर्यटकों की एंट्री के लिए मुक्की, किसली, सरही...गेट हैं। मुक्की गेट से हमारी चार सफारी बुक थीं। दो सुबह की थीं, दो शाम की। दिनभर के सफ़र  जब मुक्की पहुंचे तो वन विभाग की एक चौकी पड़ी। वहां एक पीली पर्ची काटी गई। पैसा एक ढेला नहीं लिया गया। पर, उस पर टाइम नोट कर दिया गया। ये माजरा कुछ समझ से परे था। जंगल में नौ किमी चलने के बाद मुक्की गेट आया। चौकी पर गाड़ी रुकवा ली गई। मैं नीचे उतरा। वनकर्मी ने पर्ची पर टाइम चेक किया। बोला, गाड़ी तेज चलाकर आए हो। चालान कटेगा। सड़क पर जगह-जगह मोड़ थे। स्पीड ब्रेकर थे। गाड़ी क्या आदमी भी यहां तेज क़दमों से नहीं चल सकता था। फिर चालान काहे का। वनकर्मी बोला, ये पीली पर्ची स्पीड टेस्ट के लिए है। नौ किलोमीटर में आधे घंटे लगने चाहिए थे। आप 27 मिनट में पहुंच गए। मैंने कहा, तीन मिनट के लिए क्या दो हजार का चालान काट दोगे? उसने कुछ सोचा, फिर बैरिकेड उठवा दिया। बोला, जाइए। गाड़ी धीमी चलाइयेगा।

मुक्की गेट के बाहर ही मुक्की गांव है। यहीं पर शानदार बाघ रिजॉर्ट है। जिसमें लकड़ी का शानदार काम हुआ है। एथनिक लुक दिल मोह लेता है, फिर पक्षियों की भरमार भी है। रिजाॅर्ट के मालिक विष्णु सिंह गेट पर ही हमारा इंतजार कर रहे थे। उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने डिनर भी हमारे साथ किया। वह यारबाज किस्म के इन्सान थे। थकान के बावजूद देर रात तक उनसे बात होती रही। सुबह 6.45 पर हमारी पहली सफारी थी। हमने विष्णु जी से साथ में चलने को कहा। उन्होंने बताया कि भरतपुर से उनके बचपन के मित्र आए हैं। उनके साथ कान्हा जाना है।

सुबह पांच बजे उठे। हल्की-हल्की ठण्ड थी। जिप्सी ड्राइवर कमलेश ने कम्बल रखे। रिजॉर्ट से निकलकर मुक्की गांव देखा। गांव के सारे घर नीले रंग (नील) से पुते हुए थे। कमलेश ने बताया, यह गोंड आदिवासियों का इलाका है। उनकी शिव जी में गहरी आस्था रहती है। नीलकंठ की तरह घर भी नीले रखते हैं। गांव के किसी भी घर में फाटक भी नहीं थे। सिर्फ दो बल्लियां ऐसे लगाई गई थीं कि जानवर न घुस सकें। चोरी-चकारी का सवाल ही नहीं था। रास्ते में ढेरों महुआ के पेड़ दिखे। वहां महिलाएं दुधमुंहे बच्चों को किनारे रखकर महुआ के फूल बीन रही थीं।

पहुंच गए मुक्की

आधे घंटे बाद मुक्की गेट पहुंच गए। वहां तीन जिप्सियां पहले ही पहुंच चुकी थीं। चौथा नंबर हमारा था। गेट पर ही गाइड मिलता है। इसे लेना अनिवार्य है। बुकिंग से अलग  500 रुपये देने पड़ते हैं। इधर गेट खुलते ही जिप्सियां तेजी से जंगल में घुसने लगीं, उधर गाइड बीर सिंह ने कान्हा नेशनल पार्क का वर्णन शुरू किया। कान्हा पार्क मंडला डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है। मुक्की, किसली, कान्हा, खापा… गेट हैं। 118 बाघ, 35 हजार से ज्यादा बारहसिंघे, 45 हजार हिरण।।।वह ऐसे जानकारियां देता जा रहा था, जैसे बसों में इंग्लिश स्पीकिंग की किताब, मंजन, तेल बेचने वाले देते हैं, नॉनस्टॉप। पाहुजा जी वाइल्ड लाइफर के लुक में थे। हैट, सेव टाइगर प्रिंटेड शर्ट। गले में दूरबीन। उनकी पैनी निगाहें जंगल पर थीं, बीर सिंह की बातों पर नहीं।


जिप्सी जंगल में धंसते-धंसते डीजे के इलाके में पहुंच गई। मुक्की में डीजे और शर्मीली का राज है और कान्हा में नैना, अपने बच्चों के साथ घूमती है। ध्वजा झंडी यानी डीजे के तीन शावक हैं। उसके इलाके में एक बड़ा तालाब, नहर, दो छोटे पोखरे पड़ते हैं। ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोकी। बड़े गौर से पगमार्क देखने लगा। मुझे लगा, फीता निकलकर मापने न लगे। वह पगमार्कों को फॉलो करता हुआ आगे बढ़ा। हमारी उत्सुकता भी बढ़ने लगी। आगे मोड़ पर पगमार्क मिट गए। जंगल में जिप्सी कुदाते-फंदाते उसे एक ऊंचाई वाले रास्ते पर रोक दिया गया। वहां पहले से ही कई जिप्सियां खड़ी थीं।


ड्राइवर बोला- कॉल है। जंगल में कॉल का मतलब बाघ दिखने पर जानवरों द्वारा दी जाने वाले आवाजों को कहते हैं। उन्होंने लंगूरों और सांभर की आवाजों पर ध्यान टिका दिया। जो कहीं दूर से आ रही थीं। अब वे लंगूर थे, सांभर थे, मोर थे या जंगली मुर्गे, मुझे नहीं पता। लेकिन ड्राइवर और गाइड दूरबीन लेकर जंगल में बाघ ढूंढ़ने लगे। इसी बीच दूसरी ओर से एक जिप्सी आई। ड्राइवर ने पूछा, कुछ दिखा। उस ड्राइवर ने जवाब दिया- हां, पीछे से गुजरी है। तत्काल हमारे ड्राइवर ने गाड़ी मोड़ दी। रास्ते में कुछ और जिप्सियां मिलीं। उनके ड्राइवरों के पूछने पर हमारे ड्राइवर ने भी वही जवाब दिया, जो दूसरे ड्राइवर ने हमें दिया था। 'पीछे दिखी है।' वे जिप्सियां भी जोश में आ गईं। उन जिप्सियों ने कुछ और जिप्सियों को यही जवाब दिया।


जंगल बंद होने का समय हो गया था। लेकिन डीजे और उसके बच्चे कहीं नहीं दिखे थे। पहली सफारी के बाद यह समझ में आया कि बाघ दिखने का माहौल कैसे बनता है? मुक्की गेट पर हर ड्राइवर यही कह रहा था, फलाने ने बाघ देखा। लेकिन वो फलाना ड्राइवर नहीं मिला, जिसने वाकई बाघ को देखा हो। जंगल से रिजॉर्ट पहुंचे। विष्णुजी मिले। उन्हें पूरा वाकया बताया, वह खिलखिलाकर हंसने लगे। उन्होंने बताया कि कान्हा में नैना उनकी जिप्सी के सामने से गुजरी थी। उसका वीडियो भी उन्होंने दिखाया। शाम को दूसरी सफारी 3.45 बजे से शाम सात बजे तक की थी।


सुबह की सफारी में जंगली मुर्गों, मोरों, सांभरों, लंगूरों के अलावा कुछ नहीं दिखा था। शाम को उम्मीद थी, डीजे बच्चों के साथ इवनिंग वॉक पर निकलेगी तो दिख जाएगी। इस बार ड्राइवर रोहित था। वह विष्णुजी का खास ड्राइवर था। जंगल की रग-रग से वाकिफ था। इस बार महिला गाइड मिली- सरस्वती। वह आदिवासी समुदाय की थी और नौकरी के लिए मुक्की में रह रही थी। जिप्सी चलते ही, उसने भी ज्ञान देना शुरू किया, जो सुबह बीर सिंह ने दिया था। हम तालाब, जंगल और नहर... डीजे का इलाका घूमने लगे। कई कॉल मिलीं। लेकिन न डीजे दिखी, न डीजे के बच्चे। पाहुजा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, बाघ किस्मत से ही दिखता है। महीनों जंगल में पड़े रहना पड़ता है। वह सही भी कह रहे थे। हमें एक महिला फोटोग्राफर मिली थी। जो दिल्ली से आई थी। 15 सफारी बुक कराई थीं। उसके पास इतने कैमरे और लेंस थे, जिन्हें जिप्सी में रखने तक की जगह नहीं थी। मुझे तो यह सब बाघ का हरामीपन लगा। उन्हें सफारी की टाइमिंग पता रहती है। पर्यटकों के जाते ही जंगल में बैठ जाते होंगे। कभी-कभी लंगूरों, सांभरों को कॉल देने के लिए डपट भी देते होंगे। लंगूर इंसानों के पूर्वज हैं। वे समझ जाते हैं। पर, सांभर  मची रहती है। वह बाघ को देखकर उसका पीछा करता है। इस दौरान कॉल भी देता रहता है। वह तब तक बाघ का पीछा करता है, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो जाता। कई बार अपनी इसी मुराही में बाघ द्वारा निपटा भी दिया जाता है।


अगली सुबह तीसरी सफारी में हम किसली गए। यह मुक्की से तीस किलोमीटर अंदर है। यहां बांस के जंगल हैं। इस बार गाइड रामकली थी। जो भी गाइड आता। वह हमें जंगल का रकबा, उसका इतिहास और तमाम आंकड़े बताता। रामकली ने भी यही किया। उसने सांभर, बारह सिंघा, मोर दिखाए। पाहुजा जी ने कहा, बाघ दिखाइए। जितेंद्र भाई हंस पड़े। उस दिन 70 किलोमीटर सफारी हुई, बाघ नहीं दिखा। ऊब भी लगने लगी थी। जिसकी वजह थे, जिप्सी की सुस्त रफ़्तार। दरअसल जंगल में गाड़ी 20 किमी से अधिक रफ़्तार होने पर चालान काटने का नियम है। गाइडों को जीपीएस सिस्टम दिया गया है। इधर स्पीड बढ़ी, उधर दो हजार का चालान कटा। ऐसा कोई भी ड्राइवर नहीं था, जिसका चालान न कटा हो। रोहित के भी तीन चालान कटे थे।


वापसी के दौरान डीजे के इलाके से निकले। वहां डीजे के दिखने की खबर थी। वही ड्राइवरों का बनाया हुआ माहौल था। हर कोई 'फलाने' द्वारा देखे जाने का दावा कर रहा था। पर, वह फलाना कहीं नहीं मिला। दूरबीन से दूर तक कहीं भी बाघ नहीं दिखा। एक पर्यटक ने पूछा तो मैंने कहा, ये बाघ सिर्फ ड्राइवर को ही दिखते हैं। शाम को आखिरी सफारी थी। पूरा दारोमदार उसी पर था। इस बार विष्णुजी भी हमारे साथ थे। वह हमें हर उस जगह ले गए, जहां डीजे दिख सकती थी। पर, डीजे कहीं नहीं दिखी। हम लौटने लगे तो जंगली भैंसा दिखा। गाड़ी रुकवाकर उसे काफी देर तक देखता रहा। बाघ न सही, जंगली भैंसा ही ढंग से देख लें। जंगली भैंसे के पैर सफ़ेद होते हैं। जैसे भैंसे ने मोज़े पहन रखे हों। जंगली भैंसा बाघ को पटक तक देता है। जंगल की कहानी ख़त्म। चार सफारी के बाद सिर्फ बाघ के पगमार्क, उसकी कहानियां, लंगूरों-सांभरों की कॉल ही मिली थीं।


शाम ढल गई थी। सुबह लखनऊ के लिए निकलने का प्लान था। विष्णुजी आए। वह थोड़ा सा मायूस थे। उन्हें इस बात की खब्त थी कि हमें बाघ नहीं दिखा। हालांकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। पर, वह यारबाज आदमी थे। उन्होंने कहा, कल सुबह और रुकिए। आपको बाघ दिखाकर ही भेजेंगे। मेरा मूड नहीं था। पर, पाहुजा जी का मन बाघ से प्रसन्न हो गया। वह वाइल्ड लाइफ के शौक़ीन जो ठहरे। विष्णुजी ने मुझसे कहा, कल आपको कॉपर माइन भी दिखाएंगे। कॉपर माइनिंग सुनकर मैं तैयार हो गया। उस रात बाघ से ज्यादा कॉपर माइन को लेकर उत्साहित रहा।


उस रात पाहुजा जी ने जंगल से जुड़ी कई कहानियां सुनाईं। अपने अनुभव बताए। अलग-अलग नेशनल पार्कों के कानून बताए। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के जंगलों में अगर कोई शावक पकड़ा जाता है तो उसे चिड़ियाघर ले आते हैं। फिर वह जीवनभर ज़ू का शेर बनकर रहता है। कुछ  दिन पहले पीलीभीत में एक बाघिन का शिकार हो गया था। उसके चार शावक वन विभाग के हाथ लगे। उन्हें लखनऊ ज़ू ले आया गया। बस, अब उनका जीवन एक चिड़ियाघर से दूसरे चिड़ियाघर में ही बीतेगा। वहीँ मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं होता। यहां शावकों को जंगल में ही पालते हैं। उनके लिए कुछ किलोमीटर एरिये में बाड़ लगा दी जाती है। उसमें हिरणों के बच्चे वगैरह भी रखे जाते हैं। सीसीटीवी कैमरे लगाकर निगरानी भी रखी जाती है। शावक की परवरिश जंगल में ही होती है। वहीँ शावक शिकार भी करते हैं। विष्णु जी ने बताया कि कान्हा में ऐसे ही एक शावक को पाला गया। जब वह बड़ा हुआ तो उसे खुले जंगल में छोड़ दिया गया। पर, वह बाघ हिरणों को देखकर तो निपटा देता है। लेकिन जंगली सुअरों को छूता नहीं। उनके साथ पड़ा रहता है। दोनों साथ-साथ पानी पीते तक देखे गए हैं। जब यह बाघ शावक था तो उसके बाड़े में वन विभाग हिरन के बच्चे डालता था, इसलिए वह उनका ही शिकार करता रहा। दूसरे जानवरों के शिकार की उसकी आदत ही नहीं थी।


सुबह जिप्सी तैयार मिली। ड्राइवर रोहित के अलावा विष्णुजी, उनकी पत्नी, पाहुजा जी, जितेंद्र भाई और मैं जिप्सी में थे। मुझे बाघ दिखने की कतई उम्मीद नहीं थी। पाहुजा जी खासे उत्साहित थे। विष्णुजी ने कमान संभाली। रोहित को निर्देशित करते रहे। तालाब से नहर, नहर से जंगल, पुलिया, पोखरे तक घुमाते रहे। एक घंटा हो गया था। बाघ नहीं दिखा। अब जंगल से मन उचट रहा था। बड़े वाले तालाब से जब हम लौट रहे थे कि अचानक विष्णुजी बोल पड़े-'बाघ-बाघ'। हम चौंक पड़े। फुर्ती सी आ गई। आंखें चमक उठीं। रोहित ने तत्काल जिप्सी पीछे ली। विष्णुजी ने बताया, दो हैं, दो। डीजे के बच्चे लग रहे हैं। दोनों बाघ छांव में बैठे थे। मुझे तो कहीं नहीं दिखे, पर विष्णुजी बगैर दूरबीन उन्हें देख रहे थे। काफी मशक्कत के बाद मुझे एक बाघ दिखा।

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पहली बार देखा बाघ

पहली बार जंगल में बाघ देख मैं रोमांचित हो उठा। बाघ जिप्सी से पचास मीटर की दूरी पर ऊंची-ऊंची घास के नीचे पीठ के बल लेटा हुआ था। उसके पांव ऊपर की तरफ थे। छोटे बच्चों की तरह कभी वह पैर चेहरे तक लाता तो कभी उठकर बैठ जाता। इधर-उधर देखता और फिर लेट जाता। घंटे भर तक उसकी अठखेलियां हमने देखी। पाहुजा जी ने कहा कि जब धूप चेहरे पर लगेगी तो उठेगा। फिर चलते हुए सड़क तक आएगा और चाल देखने लायक होगी। जितेंद्र भाई दूरबीन से बाघ को एकटक देख रहे थे। वह भी यूं खुले में पहली बार बाघ देख रहे थे। धूप बढ़ी। पर, बाघ टस से मस नहीं हुआ। उसका भाई वहां से उठा और घास के किनारे होते हुए जंगल में घुस गया। हमें वहां खड़ा देख, धीरे-धीरे जिप्सियों की फ़ौज आ गई। ड्राइवर और गाइड रोजीरोटी के लिए आपस में ऐसा तालमेल रखते हैं। बाघ दिखते हैं, ग्रुप पर मैसेज ड्रॉप कर देते हैं। भीड़ होने से चिल्लपौं हुई। ऐसे शोरगुल में बाघ के निकल जाने की आशंका रहती है।


हम वहां से चले गए। ब्रेकफास्ट किया और लौटे। जिप्सियां अभी भी रोड पर जमी थीं। बाघ वहां से उठकर सड़क किनारे झाड़ियों में आकर बैठ गया था। रोहित ने जिप्सी कुछ आगे बढ़ाई। दस फीट दूर बाघ शान से बैठा था। कोई हरकत नहीं। वह एकटक जिप्सियों को देख रहा था। चिड़ियाघर में जब बाघ देखते हैं तो हमारे बीच सलाखें होती हैं। डर नहीं होता। पर, जंगल में सलाखें नहीं होती। गाइड कुछ भी कहे, ड्राइवर कितना भी दिलासा दे, लेकिन खुले जांगले में बाघ देखकर सांसों का उतार-चढ़ाव बढ़ ही जाता है। डर से रोंगटे खड़े ही हो जाते हैं। मुझे भी डर लग रहा था। हालांकि वह धीरे-धीरे जाता रहा। बाघ की आंख में आंख डालकर भी देखा। यकीन मानिए, बाघ कुदरत की नायब रचना है। हमारी यात्रा सफल हो गई। विष्णुजी शिद्दत से हमें बाघ दिखाना चाह रहे थे, उनकी इच्छा भी पूरी हो गई।


जंगल बंद होने का समय हो गया था। वापस रिजॉर्ट लौटे। रास्तेभर आंखों के सामने वह बाघ घूमता रहा। उसकी बच्चों सी अठखेलियां, आंखों की गहराई और सौम्यता। 

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