विश्व पर्यटन दिवस विशेष : आस्था, श्रद्धा और विश्वास का उत्तर...

अनुषा मिश्रा 27-09-2023 11:28 AM My India

मैं मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की जन्मस्थली हूं और नटखट कान्हा की भी। मैं तथागत बुद्ध की शरणस्थली हूं और अयोध्या छोड़ने पर माता सीता की भी। मेरे हृदय में ही गंगा, जमुना और सरस्वती का संगम होता है। मेरी रगों में बहती गंगा के घाटों पर पाप-पुण्य का लेखा जोखा होता है और मोक्ष भी मिलता है। मेरी काशी में कबीर ने जीवन के अनुभवों को दर्शाते दोहे लिखे तो चित्रकूट में तुलसी ने श्रीराम के दर्शन किए। कई पक्षियों और जानवरों को पनाह देते अभ्यारण्य मैंने बसाए हैं। कल-कल करते झरने और नदियां मेरी खूबसूरती बढ़ाते हैं। मैं वन्य जीव प्रेमियों के कौतूहल का उत्तर हूं। मैं घुमक्कड़ों की घुमक्कड़ी का उत्तर हूं। मंदिरों, मठों, स्तूपों में बसी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का उत्तर हूं। मैं इतिहास का उत्तर हूं और वर्तमान का उत्तर हूं…। मैं उत्तर प्रदेश हूं। 


यूं तो घूमने के लिए हमारे देश में कई राज्य हैं। सब एक से एक खूबसूरत हैं और सबकी अपनी महत्ता है, लेकिन कहते हैं कि ‘यूपी नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा’। यह बात सोलह आने सच है। आपने ऊंचे-ऊंचे पहाड़ देख लिए, अथाह दूरी तक फैला समंदर देख लिया लेकिन अगर आस्था और विश्वास की डोर को मजबूती से बांधे राम और कृष्ण की जन्मभूमि मुझे यानी उत्तर प्रदेश को नहीं देखा तो वाकई आपने कुछ नहीं देखा। तो चलिए मेरे साथ, मेरे ही अद्भुत सफर पर और जानिए कि सिर्फ ताजमहल ही नहीं, मेरे पास घुमक्कड़ों को देने के लिए और भी बहुत कुछ है। विश्व पर्यटन दिवस पर चलिए मेरे साथ मेरे ही एक अनोखे सफर पर…

अयोध्या

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अयोध्या प्रभु श्री राम की जन्मस्थली है। यहां उनकी किलकारियां भी गूंजती हैं और माता सीता से विछोह के बाद सबसे छुपकर ली गईं सिसकियां भी सुनाई देती हैं। अयोध्या की धरती पर लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे आदर्श भाइयों की कहानियां भी सांसें ले रही हैं और बेटे से दूर होने पर राजा दशरथ के दम तोड़ने की कथा भी। यहां कौशल्या की ममता बसती है तो कैकयी का पश्चाताप भी। यहां उर्मिला की प्रतीक्षा है तो भरत का समर्पण भी। भले ही युग बदल गए हों, समय बदल गया हो, लेकिन अयोध्या तब भी राम की थी और अयोध्या आज भी राम की है। स्कंदपुराण के अनुसार अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है। अयोध्या का सबसे पहला वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद में अयोध्या को देवताओं का नगर बताया गया है। अयोध्या में सरयू नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं। इनमें गुप्तार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि बेहद खास हैं। मंदिरों में यहां कनक भवन सबसे सुंदर है तो हनुमानगढ़ी का महत्व सबसे ज़्यादा है। इसके साथ ही नागेश्वर नाथ मंदिर, दशरथ महल, राम की पैड़ी, श्री राम जन्मभूमि न्यास भी देखने लायक जगहें हैं। 


कैसे पहुंचें


अयोध्या के लिए लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर और अन्य शहरों से बस की अच्‍छी सुविधा उपलब्‍ध है। दिल्ली जैसे शहरों से अयोध्या के लिए वॉल्वो कोच और डीलक्स बसें भी चलती हैं। अयोध्या कई शहरों जैसे दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी और इलाहबाद से अच्‍छी तरह जुड़ा हुआ है। अयोध्‍या जाने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट लखनऊ हवाई अड्डा है जो अयोध्या से 130 किमी. की दूरी पर है। यहां से आप एक प्राइवेट टैक्सी या बस हायर कर सकते है जो आसानी से अयोध्या तक पहुंचा देगी।

मथुरा

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भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली है मथुरा। यहीं कंस के बन्दीगृह की एक कोठरी में उनका जन्म हुआ था जो जन्मभूमि के रूप में आज भी मशहूर है और जहां के दर्शन करने के लिए आज भी भक्तों की लाइन लगी रहती है। दुनिया में सबसे ज़्यादा पूजे जाने वाले भगवानों में से एक हैं कृष्ण जी। कहीं इन्हें ठाकुर जी कहा जाता है तो कहीं द्वारकाधीश, कहीं इन्हें जगन्नाथ कहा जाता है तो कहीं श्रीनाथ। कृष्ण के हज़ारों नाम हैं और इतने ही रूपों में इनकी पूजा होती है। कहते हैं कि जो जिस रूप में, जिस तरह चाहे इनका ध्यान करे, वे उसके हो जाते हैं। मथुरा में आज भी कृष्ण की पूजा लोग अपना बालक मान कर करते हैं। यहां हर घर में कान्हा को बच्चा मानकर उनकी सेवा की जाती है। लोग उन्हें प्यार करते हैं, लेकिन डांटने का भी हक़ रखते हैं। मथुरा में ज़्यादातर घरों में रोज़ ताज़ा मक्खन निकाला जाता है। कहते हैं कि अगर उनके घर दामाद भी आ जाए तो उसे एक दिन पुराना मक्खन दिया जाता है क्योंकि ताज़ा मक्खन तो उनके कान्हा के लिए होता है। यहां आएं तो कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, द्वारकाधीश मंदिर, बिड़ला मंदिर, जुगलकिशोर जी मंदिर में दर्शन ज़रूर करें।


कैसे पहुंचें

मथुरा के लिए उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर शहरों से बस मिल जाती हैं। आगरा होकर भी मथुरा आया जा सकता है। दिल्ली से दक्षिण भारत की ओर जाने वाली ज़्यादातर ट्रेन मथुरा होकर जाती हैं। यहां से निकटतम हवाई अड्डा इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली है जो इस शहर से लगभग 200 किलोमीटर दूर है। हवाई अड्डे से यहां पहुंचने में करीब 4 घंटे लगेंगे। 

वृंदावन

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जहां प्रेम की धुन पर गोपियों संग नाचते थे कृष्ण-कन्हैया, वह वृंदावन ही है भइया। भले ही कान्हा ने यहां जन्म न लिया हो, लेकिन उनका बचपन वृंदावन की गलियों में ही बीता। वृंदावन के कण-कण में राधा और कृष्ण के प्रेम की ध्वनि गूंजती है। वृंदावन के निधि वन के बारे में मान्यता है कि यहां आज भी हर रात भगवान कृष्ण गोपियों संग रास रचाते हैं। यही कारण है कि निधिवन को शाम की आरती के बाद बंद कर दिया जाता है। उसके बाद यहां कोई नहीं रहता। यहां तक कि कहते हैं निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी शाम होते ही यह जगह छोड़कर चले जाते हैं। निधिवन के अंदर है ‘रंग महल’, जिसके बारे में मान्यता है कि रोज रात यहां पर राधा और कान्हा आते हैं। रंग महल में राधा और कन्हैया के लिए रखे गए चंदन के पलंग को शाम सात बजे से पहले सजा दिया जाता है। पलंग के बगल में एक लोटा पानी, राधाजी के श्रृंगार का सामान और दातुन संग पान रख दिया जाता है। कहते हैं सुबह पांच बजे जब ‘रंग महल’ का पट खुलता है तो बिस्तर अस्त-व्यस्त, लोटे का पानी खाली, दातुन कुचली हुई और पान खाया हुआ मिलता है। रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते हैं और प्रसाद स्वरूप उन्हें भी श्रृंगार का सामान ही मिलता है। यहां लगे पेड़ भी दिखने में वर्षों पुराने लगते हैं। कहते हैं कि यही पेड़ रात में गोपियों में बदल जाते हैं और कृष्ण संग रास रचाते हैं। वृंदावन का बांके-बिहारी मंदिर सबसे अधिक धार्मिक महत्ता वाला है। इसके अलावा यहां प्रेम मंदिर, रंगजी मंदिर, इस्कॉन मंदिर, राधा रमण मंदिर, शाहजी मंदिर, गोविंददेव मंदिर भी देखने लायक हैं।


कैसे पहुंचें

सड़क मार्ग के जरिये आप मथुरा होकर सीधे वृंदावन आ सकते हैं। दिल्ली और आगरा जैसे शहरों से कुछ बसें सीधे वृंदावन भी आती हैं। नई दिल्ली से दक्षिण भारत की ओर जाने वाली अधिकांश ट्रेन मथुरा स्टेशन होकर जाती हैं। आपको पहले मथुरा स्टेशन आना होगा।मथुरा स्टेशन पर उतरकर आप ऑटो या टैक्सी के जरिए वृंदावन जा सकते हैं। यहां का निकटतम हवाई अड्डा भी नई दिल्ली है। 

झांसी

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 हमारे देश को आज़ादी दिलाने में इस जगह का बहुत बड़ा योगदान है। 1857 में हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम में झांसी के योगदान को कोई नहीं भूल सकता और बात जब झांसी की आती है तो वह यहां की रानी के बिना पूरी नहीं होती। अगर ये कहा जाए कि झांसी को पहचान ही यहां की रानी की वजह से मिली तो गलत नहीं होगा। सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता 'झांसी की रानी' में लिखा है - 


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, 

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, 

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में, 

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।


जब तक रानी यहां रहीं उन्होंने अपने खून के एक-एक कतरे से झांसी को सींचा। अब भले भी बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन आज भी लक्ष्मीबाई झांसी की हवा में जिंदा हैं। महिलाओं की ताक़त और महानता को समझना हो तो एक बार झांसी का रुख ज़रूर करिएगा। रानी की अनगिनत कहानियों के साथ आपको यहां घूमने के लिए भी ऐसा बहुत कुछ मिलेगा जो आपका परिचय यहां के इतिहास से कराएगा। इसमें से सबसे खास है झांसी का किला। झांसी के किले का निर्माण 1613 ई. में ओरछा शासक वीरसिंह बुन्देला ने कराया था। किंवदंती है कि राजा वीरसिंह बुन्देला ने दूर से पहाड़ी पर एक छाया देखी, जिसे बुन्देली भाषा में 'झांई सी' बोला गया। इसी शब्द के अपभ्रंश से शहर का नाम झांसी पड़ा। कुछ समय तक इस पर मराठाओं का राज रहा और फिर राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने इसे अपने कब्जे में करने का प्रयास किया। रानी लक्ष्मीबाई ने ये मानने से मना कर दिया और विद्रोह किया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ये फिर ब्रिटिश शासन में चला गया। अगर आप झांसी आ रहे हैं तो बरुआ सागर, रानी महल, झांसी संग्रहालय और गणेश मंदिर ज़रूर जाएं।


कैसे पहुंचें

झांसी सड़क और रेल नेटवर्क से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 25 और 26 पर पड़ता है। झांसी मुंबई-दिल्ली मार्ग पर एक जंक्शन है, जो रेल मार्ग के जरिये भी ज़्यादातर बड़े शहरों से जुड़ा है। यहां के निकटतम हवाईअड्डा ग्वालियर (103 किलोमीटर) और खजुराहो (175 किलोमीटर) हैं। 

प्रयागराज

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तीर्थराज प्रयागराज के दर्शन किए बिना आपका उत्तर प्रदेश का सफर कैसे पूरा हो सकता है! कहते हैं कि ये तीर्थों का राजा है और ऐसा क्यों कहते हैं इसके पीछे एक कहानी है। मान्यताओं के अनुसार, एक बार शेषनाग से ऋषियों ने पूछा कि प्रयागराज को तीर्थराज क्यों कहा जाता है? इस पर शेषनाग ने उत्तर दिया कि एक ऐसा अवसर आया, जब सभी तीर्थों की श्रेष्ठता की तुलना की जाने लगी। उस समय भारत में सभी तीर्थों को तराजू के एक पलड़े पर रखा गया और प्रयागराज को दूसरे पलड़े पर, फिर भी प्रयागराज का पलड़ा भारी पड़ गया। दूसरी बार सप्तपुरियों को एक पलड़े में रखा गया और प्रयागराज को दूसरे पलड़े पर, वहां भी प्रयागराज वाला पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार प्रयागराज की प्रधानता होने से इसे तीर्थों का राजा कहा जाने लगा। प्रयागराज इकलौती ऐसी जगह है जहां तीन नदियों का संगम होता है। यह शहर प्रयाग से इलाहाबाद बना और फिर प्रयागराज बन गया। नाम भले ही जो भी रहा हो, लेकिन इस शहर में जो बात थी वह कभी नहीं बदली। संगम के किनारे वाली इसकी खूबसूरत सुबहें और सुरमई शामें सदियों से लोगों को लुभा रही हैं। यह शहर ब्रिटिश राज के खिलाफ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का केंद्र था और आनंद भवन इसका केंद्र बिंदु था। यहीं महात्मा गांधी ने भारत को मुक्त करने के लिए अहिंसक विरोध का कार्यक्रम पेश किया था। प्रयागराज ने स्वतंत्रता के बाद भारत को सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री पद दिए हैं – जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वी.पी.सिंह। पूर्व प्रधान मंत्री चंद्रशेखर भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे। त्रिवेणी संगम के अलावा यहां खुसरो बाग, आनंद भवन, किला, जवाहर तारामंडल, अशोक स्तंभ, ऑल सैंट कैथेड्रल जैसी जगहें भी देखने लायक हैं। 


कैसे पहुंचें 

यह उत्तर प्रदेश और भारत के लगभग सभी शहरों से जुड़ा है। तीन बस अड्डों से, अंतरराज्यीय बस सेवाओं के माध्यम से प्रयागराज देश के विभिन्न मार्गों से जुड़ा है। प्रयागराज में आठ रेलवे स्टेशन हैं जो भारत के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बंगलौर, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, भोपाल, ग्वालियर, जयपुर आदि से जुड़े हुए हैं। प्रयागराज हवाई अड्डे से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता रायपुर, इंदौर, बंगलुरू, गोरखपुर समेत कई शहरों के लिए डेली फ्लाइट्स हैं।

लखनऊ

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गंगा-जमनी तेरी तहज़ीब का पैगाम कहूँ

तुझको आदाब करूँ और तुझे सलाम कहूँ

दिलों में 'जोश' ज़ुबां पर 'मीर'

यहाँ अलमस्त कलंदर पीर

रवायत-रस्मों का उन्माद

निखरते रंगों की तासीर

बहुत रंगीन तुम्हारी शाम

नज़र किस तरह करे आराम

रात की बिखरी निखरी ज़ुल्फ़ 

भरे चाहत के खाली जाम


तेरी आग़ोश को तस्कीन के आयाम कहूँ

तुझको आदाब करूँ और तुझे सलाम कहूँ

-पंकज प्रसून


लखनऊ को समझने के लिए पंकज प्रसून की ये कविता एकदम सटीक है। लखनऊ अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और खूबसूरत शामों के लिए जाना जाता है। किसी के लिए ये ख्वाबों का शहर है, तो किसी के लिए इश्क़ का। किसी के लिए ये नवाबों का शहर है तो किसी के लिए क्रांति की लहर का। किसी को यहां की चिकन की कढ़ाई लुभाती है तो किसी पर ज़री-जरदोजी फबती है। किसी की जुबां प्रकाश की कुल्फी पर फिसल जाती है तो किसी को शर्मा की चाय बुलाती है। किसी को टुंडे के कबाब पसन्द हैं तो किसी को यहां की चाट भाती है। किसी को रूमी दरवाज़े के सामने तस्वीर लेने का चस्का है तो किसी को बस हज़रतगंज की शाम ही सुकून दे जाती है। किसी की मन्नत खम्मन पीर पर पूरी होती है तो किसी को हनुमान सेतु मंदिर में सिर झुका कर दुनिया की खुशी मिल जाती है। कोई पुराने लखनऊ का दीवाना है तो किसी को नए लखनऊ में दुनिया आगे बढ़ती नज़र आती है। कुल मिलाकर लखनऊ में बहुत कुछ है जो हर किसी की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए हर वक़्त तैयार रहता है। यहां का इतिहास देश का गौरव है, वर्तमान सिर उठाकर खड़ा है और भविष्य में अपार संभावनाएं हैं। आप घूमने के शौकीन हों या खाने के लखनऊ आपको निराश नहीं करेगा। यहां इमामबाड़ा, रेजीडेंसी, छतर मंजिल, अम्बेडकर पार्क, रूमी दरवाज़ा, सतखंडा, जनेश्वर मिश्र पार्क जैसी कई जगहें हैं जहां आप घूमने जा सकते हैं। 


कैसे पहुंचें

सड़क मार्ग से लखनऊ जाने के लिए बसों की अच्‍छी सुविधा है। यहां से स्थानीय और बाहरी क्षेत्रों के लिए डीलक्स और नॉन डीलक्स बसें काफी हैं जो सस्ती और सुविधाजनक हैं। लखनऊ में चारबाग, गोमतीनगर, आलमबाग जैसे प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं। देश के लगभग सभी हिस्सों से यहां के लिए ट्रेन आसानी से मिल जाती हैं। अगर वायुमार्ग से लखनऊ आना चाहते हैं तो यहां के चौधरी चरण सिंह हवाईअड्डे के लिये भी ज़्यादातर शहरों से डायरेक्ट या इंटरकनेक्टेड फ्लाइट्स मिल जाती हैं। 

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